रायपुर। मेडिकल सर्विसेज कारपोरेशन हालांकि, सभी राज्यों में है मगर छत्तीसगढ़ के लिए इसलिए महत्वपूर्ण रहा कि स्वास्थ्य विभाग के घपले-घोटाले से आजिज आकर इस कारपोरेशन का गठन किया गया और वही मकसद पूरा नहीं हो पाया बल्कि यह अब कुव्यवस्थाओं और गडिबड़ियों का निगम बनकर रह गया है।

रमन सिंह की सरकार में जब सीजीएमसी का गठन किया गया, उस समय आईएफएस प्रताप सिंह को इसका प्रबंध निदेशक बनाया गया। हालांकि, आईएफएस को एमडी बनाने को लेकर बड़ा विरोध हुआ। लोगों ने कहा कि जंगल अधिकारी के हाथों सरकार ने लोगों की जानमाल सौंप दिया। मगर प्रताप सिंह ऑनेस्ट और निर्विवाद अफसर थे। इसलिए सरकार ने किसी उन्हें चुनकर इस निगम की जिम्मेदारी सौंपी थी।
प्रताप सिंह ने सही दिशा में इसका काम बढ़ाया भी मगर बाद में आए अधिकांश प्रबंध निदेशकों में से कुछ पैसे के मोह में तो कुछ अज्ञानता के चलते सीजीएमसी के खटराल अधिकारियों के मोहरा बनकर रह गए।
2 करोड़ लोगों की जान का सवाल
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छत्तीसगढ़ की 2.40 करोड़ की आबादी में मोटे तौर पर दो करोड़ से अधिक लोग सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है। आंकड़े बताते हैं, देश के 28 राज्यों में सरकारी अस्पतालों पर निर्भरता वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ टॉप फाइव में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ में मात्र 40 लाख से भी कम लोग प्रायवेट अस्पतालों में इलाज कराने जाते हैं।
सीजीएमसी में प्रताप सिंह के बाद आईएएस को एमडी बनाया जाने लगा। एमडी के अलावे दसेक प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी होंगे। और 65 संविदा कर्मचारी, अधिकारी। इसके अलावा करीब छह सौ अधिकारी, कर्मचारी आउटसोर्सिंग वाले हैं। याने उन्हें हायर किया गया है।
करोड़ों की फाइल डील
सीजीएमएससी में वित्तीय अनुशासनहीनता का ये आलम है कि आउटसोर्सिंग स्टाफ करोड़ों रुपए के दवाओं और उपकरणों की फाइलें डील कर रहे हैं। उन्हें कोई देखने वाला है नहीं। निगम का अपना कोई अधिकारी, कर्मचारी हो तो उसकी एकाउंटबिलिटी होगी। प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों को सीजीएमएससी के प्रति क्या जवाबदेही होगी। वे लूटेंगे और चल देंगे…जैसा इस समय चल रहा है। आखिर, करोड़ों के घोटालों का पर्दाफाश यूं ही थोड़े हो रहा है।
सबसे अधिक खेला उपकरण और रिएजेंट में
सीजीएमससी से जुडे जानकारों का कहना है कि पहले दवा खरीदी में खेला कम होता था मगर अब दुर्भाग्यजनक स्थिति यह है कि अमानक दवाइयां भी खरीदी जाने लगी हैं। वैसे सरकारी धन का सबसे अधिक वारा-न्यारा उपकरण और रिएजेंट खरीदी में किया जाता है। इसमें अरबों का खेला होता है। मेडिकल उपकरणों में छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं। असली से लेकर फर्जी तक। सीजीएमएससी के भ्रष्ट अफसर उपकरणों के टेंडर में खेला कर देते हैं। कई अज्ञानी एमडी को समझ में नहीं आता कि टेंंडर में नीचे वाला खेला कर दिया है, और उसे हरी झंडी मिल जाती है। दरअसल, उपकरणों का टेंडर ही ऐसा किया जाता है कि जिस कंपनी को उपकृत करना हो, वही इसमें पार्टिसिपेट कर सके। बाकी किनारे हो जाए।
4 करोड़ की सिटी स्केन 11 करोड़ में
पिछले एक दशक की खरीदी की अगर सीबीआई या ईओडब्लू जांच करा दी जाए तो कई एमडी से लेकर जीएम और अफसर सलाखों के पीछे चले जाएंगे। आलम यह है कि चार-पांच करोड़ की सिटी स्केन 11 करोड़ में खरीदे जा रहे हैं। उसमें भी कंपनियां वारंटी की शर्तेर् नहीं लिखवाती। बाद में खराब होने पर लाखों रुपए ऐंठकर उसे सुधारा जाता है। रिएजेंट में अफसरों ने सौ गुना रेट पर खरीदी कर ली। वो भी तब, जब उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। सिर्फ सरकारी पैसा डकारने के लिए। ऐसे में, सरकारी अस्पतालों और दो करोड़ गरीब लोगों का भगवान ही मालिक है।
