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छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला महाकवि कपिलनाथ कश्यप

Nkc News Desk March 6, 2025

Raipur: आज अलग छत्तीसगढ़ राज अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के बने के बाद छत्तीसगढ़ी लिखई के संगे-संग पढ़ई घलो ह पाँखी लगा के उड़ियाए ले धर लिए हे, तेमा वैज्ञानिक आविष्कार के चलत इंटरनेट के माध्यम ले आए सोशलमीडिया ह एमा सोन ऊपर सोहागा चढ़ा दिए हे. एकरे सेती आज छत्तीसगढ़ी ल अपन माटी राज छत्तीसगढ़ के संगे-संग दुनिया भर म थोक-बहुत तो पढ़ेच जावत हे. फेर आज के उड़ान के जनम कइसे गढ़न होइस. एकर नेंव म कोन मन अउ कतका मिहनत ले पखरा रचिन तेनो ल तो सरेखे जाना जरूरी हे.
छत्तीसगढ़ी के नेंव ल टमड़े ले जानबा मिलथे, के जे मन के एमा जबड़ बुता हे, वोमा महाकवि कपिलनाथ कश्यप जी के नॉव सोन आखर म लिखाय दिखथे. कपिलनाथ कश्यप जी ल छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला महाकवि के रूप म चिन्हारी करे जाथे, जे मन वो बेरा छत्तीसगढ़ी भाखा म तीन महाकाव्य श्री रामकथा, श्री कृष्ण कथा अउ श्री महाभारत कथा लिख के छत्तीसगढ़ी भाखा के भंडार ल पोठ करे हें. ए तीनों महाकाव्य के संगे-संग हीरा कुमार (खण्ड काव्य), सीता के अगनी परीछा (खण्ड काव्य), अब तो जागौ रे (काव्य संग्रह), डहर के काँटा (काव्य संग्रह), नावा बिहान (एकाँकी), अंधियारी रात (एकाँकी), गोहार (एकाँकी), गुरावट बिहा (एकाँकी), ग्राम सुधार (एकांँकी), पापी पेट (एकाँकी), निबंध निसेनी (निबंध) लिख के छत्तीसगढ़ी के कोठी ल लबालब भरे के बड़का बुता करे हें.
6 मार्च 1906 म जांजगीर-चाँपा जिला के गाँव पौना के संपन्न किसान शोभनाथ अउ महतारी चन्द्रावत देवी के घर जनमे कपिलनाथ कश्यप जी के लगाव छात्र जीवन ले ही साहित्य डहार रिहिस. फेर उँकर लेखन राजस्व विभाग के नौकरी म आए बाद चालू होइस. तब उन हिन्दी म ही साहित्य रचना करयँ.
इहाँ ए बात म चर्चा करे के मन होवत हे, के एक छत्तीसगढ़ी महतारी भाखा वाले मनखे हिन्दी म लिखे के शुरुआत काबर करथें? पहिली के जम्मो पुरखा साहित्यकार मन के संगे-संग हमू मन अइसने करेन. एकर असल कारन आय, शिक्षा के माध्यम. भले हमर मन के महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी आय, फेर हम सबके स्कूली पढ़ई हिन्दी माध्यम ले होए हे, तेकर सेती साहित्य लेखन के शुरुआत घलो हिन्दी ले होए हे. एकरे सेती हमन महतारी भाखा म प्राथमिक शिक्षा होना चाही कहि के सरकार जगा गोहरावत रहिथन. अभी के केन्द्र सरकार ह तो जेन नवा शिक्षा नीति के घोषना करे हे, तेमा महतारी भाखा के माध्यम ले ही प्राथमिक शिक्षा होना चाही कहे हे, फेर राज सरकार ह अभी एती चेत नइ कर पाए हे. वइसे राज सरकार के मुखिया ह घलो एक पइत कहे रिहिन के महतारी भाखा के माध्यम ले ही प्राथमिक शिक्षा चालू होही कहिके फेर ए कथन ह अभी स्कूल मन म जमीनी रूप ले लागू नइ हो पाए हे. भरोसा करथन, के अवइया बेरा म अइसन हो पाही, तब छत्तीसगढ़ी महतारी भाखा वाले मन घलो साहित्य लेखन के शुरुआत ही छत्तीसगढ़ी ले करहीं.
कश्यप जी के जुन्ना पोथी मनला देखे ले जानबा मिलथे, के उनला लेखन खातिर प्रेरणा वो बेरा के प्रतिष्ठित एकांकीकार रहे उँकर गुरु रामकुमार वर्मा जी ले इर्विन क्रिश्चियन कालेज इलाहाबाद म पढ़त खानी ही मिलिस, जिहाँ ले उन सन् 1931 म स्नातक परीक्षा पास करिन. अउ फेर राजस्व विभाग के नौकरी म आए के बाद नौकरी ले कुछ बेरा निकाल के साहित्य साधना म लगावयँ. तब उन वैदेही विछोह, युद्ध आमंत्रण, बावरी राधा, श्रीराम जानकी विवाह अउ राम राज्य आदि खण्ड काव्य के सृजन करिन. ए सबो खण्ड काव्य हिन्दी म रहिन. उँकर पहला रचना के प्रकाशन 1968 म “विदेही विछोह” के रूप म होइस, जे ह प्रयास प्रकाशन ले छपे रिहिसे.
बछर 1968 के बेरा ह उँकर जीवन के महत्वपूर्ण बेरा आय. इही बखत उँकर जीवन म बड़का बदलाव घलो आइस. राजस्व विभाग के नौकरी ले सेवानिवृत्त होए के बाद उन बिलासपुर म रहे लगिन, तब ए क्षेत्र के साहित्यकार मन संग उँकर मेलमिलाप बाढ़िस. इही मन म वो बखत एमए करत विनय कुमार पाठक, बलराम पांडेय आदि मन संग भेंट होइस. फेर इँकरे मन के कहे अउ प्रोत्साहित करे म उन छत्तीसगढ़ी म लिखे के शुरुआत करिन. फेर मन म इहू गुनत रहिन, के छत्तीसगढ़ी म लिखहूँ त विद्वान अउ गुनी साहित्यकार मन का गुनहीं सोचहीं? आखिर बड़ सोच-विचार के अपन ईष्ट देव ल सुमर के “श्रीराम कथा” महाकाव्य के रचना करिन.
छायावाद के प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पांडेय जी कश्यप जी के ‘श्रीराम कथा’ ल देख के दंग रहिगें. अउ वोला सिरिफ आठेच दिन म पूरा पढ़ डारिन. संग म भूमिका लिखिन. जेमा उन लिखिन- “कविवर कपिलनाथ कश्यप का मैं अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जिनकी वजह से मुझे छत्तीसगढ़ी में ‘श्रीराम कथा’ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ
इसमें पद-पद पर उनकी रामभक्ति का परिचय मिलता है. कवि ने अपने जीवन भर की कमाई श्री राम के चरणों में चढ़ा दी है, भगवान भावग्राही हैं, उसे अवश्य स्वीकार करेंगे. कवि का जीवन धन्य हो गया. उनकी लेखनी सफल हो गई.”
कश्यप जी के छत्तीसगढ़ी म लिखे ए पहला महाकाव्य ल ‘मानस चतुस्ती शताब्दी समारोह समिति’ ह बरिस 1974 म छपवाइस, जेला मध्यप्रदेश साहित्य परिषद ले बरिस 1975 म लोक साहित्य के प्रतिष्ठित “ईसुरी पुरस्कार” ले सम्मानित करे गिस.
कश्यप जी जेन बखत ये सब रचना मनला सिरजाईन तब आज के जइसन प्रचार-प्रसार के गंज अकन साधन उपलब्ध नइ रिहिस, जेकर सेती लोगन उँकर साहित्य के गरिमा ल वतका नइ टमड़ पाइन जतका टमड़े जाना रिहिसे. उन श्रीराम कथा, श्रीकृष्ण कथा महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता जइसन पोथी पुराण ल छत्तीसगढ़ी म लिखके बड़का संत ऋषि मन जइसे तपस्या करे हें.
आज मैं “कपिलनाथ कश्यप जयंती आयोजन समिति” ले दूनों हाथ के दसों अंगरी ल जोर के अरजी करत हंँव, के उन श्रद्धेय कश्यप जी के ए जम्मो धरोहर मनला पोथी के रूप म जादा ले जादा छपवाए के संगे-संग वोमा के प्रमुख प्रसंग मनला संगीतबद्ध करवा के जन-जन म बगराए के घलो बुता करय. एकर ले जे मन पोथी-पतरा पढ़े नइ पावयँ उहू मनला संगीत के माध्यम ले भगवान कथा अउ अध्यात्म के अमरित पान करे के भाग मिल जाही.
आवव कश्यप जी के पहला छत्तीसगढ़ी महाकाव्य ‘श्रीराम कथा’ के डाँड़ देखिन-
होनहार हर होबे करथे चाहे लाख उपाय करा.
बिना बलाय जबरन आथे, चाहे कतको बाँध धरा..

जब काकरो पतन होथे त वोकर बुद्धि भ्रष्ट हो जाथे ए बात ल कतका सुग्घर लिखे हें-
जब जेकर जात्ती आ जाथे वोकर बुद्धि नठा जाथे.
काम बिगड़ जाये के पाछू मुड़ पटक के पछताथे..

‘श्रीराम कथा’ के बाद कश्यप जी ‘श्री कृष्ण कथा’ के सिरजन करिन. ए महाकाव्य के संदर्भ म छायावाद के प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पाण्डेय लिखथें- ‘ कश्यप जी ने छत्तीसगढ़ी में कृष्ण कथा सुलभ कर दी, कथा का आधार भागवत पुराण है. यह उनके पूर्व जन्म के पुण्य का ही फल है. कश्यप जी ने इस महाकाव्य का सृजन कर अध्यात्म की ओर प्रवृत होकर परलोक को सुधारने के लिए श्री कृष्ण की बाल लीला का वर्णन बड़े ही तन्मयता से किया है-
ठग ठग दूध पियाथस मोला
चूँदी छू के कहय कन्हइया,
कतक बेर ले दूध पियाबे
चिटको अबले बढ़िस न मइया.

उधो अउ गोपी मनके प्रसंग के चार डाँड़ देखव, जेमा उधो के निरगुण ज्ञान ल ठुकरावत दू आखर कहि देथें-
बिन सोंचे समझे उधो तू ब्रज म आया
महुरा भरे स्याम संदेशा इहा सुनाया
लेगे ठग के कान्हा ला अक्रुर इहाँ ले
अइसे लगथे जाहव अव प्रान इहाँ ले.

गीता म भगवान कृष्ण कर्म के संदेश देवत कहे हें- ‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ एला कश्यप जी छत्तीसगढ़ी म कतका सुग्घर कहे हें-
करम जोग निस्काम बीज के अरजुन नास न होवय.
उल्टा वोकर साधक ला, चिटको फल दोस न होवय..

यदा यदा ही धर्मस्य… वाले श्लोक के छत्तीसगढ़ी रूप देखव-
जब जब होथे हानि धरम के, अधरम बढ़ जाथे संसार.
तब तब रच के रूप अपन मैं परगट होथँव ले अवतार..

धार्मिक महत्व के तीनों महाकाव्य के संगे-संग अउ जम्मो विषय म अपन लेखनी ल रेंगइया कश्यप जी के प्राथमिक शिक्षा अपन बड़े भाई हीरालाल जी के छाँव म राहत गाँवेच म होइस, तेकर पाछू मिडिल के पढ़ई बिलासपुर म करिन, फेर नवमी ले लेके उच्च शिक्षा ल इलाहाबाद म 1931 म पूरा करिन. छात्र जीवन के बेरा उन स्वाधीनता आन्दोलन म घलो सँघरिन, जेकर सेती जेलयात्रा घलो करे ल परिस. राजस्व विभाग के कतकों पद म राहत उन बछर 1961 म दुरुग जिला ले सेवानिवृत्त होके साहित्य के अथाह साधना म मगन होगिन. हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य संसार ल गौरवान्वित करत ए महाकवि महामानव ह 2 मार्च 1985 के नश्वर देंह के त्याग करत परमधाम के रद्दा रेंग देइन.
उंकर सुरता ल पैलगी.. जोहार 🙏
-सुशील भोले

Tags: कपिलनाथ कश्यप छत्तीसगढ़ी भाखा पहला महाकवि

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