रायपुर: हैहयवंशी राजाओं ने रायपुर में सिद्धपीठ महामाया मंदिर का निर्माण कराया था. इस मंदिर में नवरात्र के दौरान विशेष पूजा और अनुष्ठान किया जाता है. चैत्र नवरात्रि को लेकर भी महामाया मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की तैयारी की गई है. सिद्धपीठ महामाया मंदिर तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा. इस मंदिर की विशेषता यहीं पर खत्म नहीं होती. देवी के इस धाम में एक साथ भैरव बाबा के दो स्वतंत्र मंदिर हैं, जिसमें एक में काल भैरव और दूसरे में बटुक भैरव विराजमान हैं. कई पीढियों से सिद्धपीठ महामाया के इस मंदिर में 7 साल की कुंवारी कन्या के माध्यम से नवरात्र का प्रथम ज्योत प्रज्वलित कराया जाता है. इस साल भी यह परंपरा को निभाया जाएगा.

सात साल की कुंवारी कन्या जलाएगी ज्योत: इस साल भी इस मंदिर में सात साल की कुंवारी कन्या ज्योत जलाएगी. ऐसा माना जाता है कि मां स्वयं प्रकट होकर ज्योत प्रज्वलित करने आई है. इस ज्योत के बाद ही भक्तों द्वारा प्रज्वलित कराए जाने वाले ज्योतों को प्रज्वलित किया जाता है. इस परंपरा और इस मंदिर के बारे में मां महामाया मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला ने ईटीवी भारत को विशेष जानकारी दी.
चैत्र नवरात्रि पर महामाया मंदिर की परंपरा
महामाया मंदिर का गौरवशाली इतिहास: पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि “यह मंदिर काफी प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों में से एक माना जाता है. क्षेत्र की प्राचीन वंशावली को देखें तो यह हैहयवंशी राजाओं की रही है उनकी कुलदेवी मां महामाया है. हैहयवंशी राजाओं ने जहां-जहां पर अपना राजमहल बनवाया या किला बनवाया था. वहां पर अपनी कुलदेवी मां महामाया को स्थापित किया था. छत्तीसगढ़ में 36 किले बनाए गए थे इसके कुछ अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं. 36 जगहों पर राजाओं ने अपनी कुलदेवी महामाया के मंदिर बनवाए थे. रायपुर के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि यह मंदिर तांत्रिक विधि से निर्मित है जिसमें तंत्र साधना के साथ ही बड़े बड़े पूजा और अनुष्ठान किए जाते रहे हैं.
लगभग 7 साल की कुंवारी कन्या से माचिस या अग्नि से नहीं बल्कि चकमक पत्थर को घिसकर अग्नि प्रज्वलित की जाती है. इस अग्नि से प्रथम ज्योत कुंवारी कन्या के द्वारा प्रज्वलित कराई जाती है. जिसके बाद भक्तों के द्वारा प्रज्वलित कराए जाने वाले अन्य ज्योत प्रज्वलित किए जाते हैं- विजय कुमार झा, मां महामाया मंदिर के व्यवस्थापक
मंदिर के व्यवस्थापक विजय कुमार झा ने बताया कि कुंवारी कन्या का श्रृंगार करके देवी स्वरूपा और महामाया स्वरूपा मानकर इस जोत जलाने की परंपरा की शुरुआत होती है. यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है. ऐसा माना जाता है कि इस ज्योत को कोई कुंवारी कन्या नहीं बल्कि माताजी ने स्वयं प्रज्वलित किया है. बिना किसी विघ्न और बाधा के नौ दिनों तक नवरात्रि में जोत प्रज्वलित होते हैं.
