राजिम। हरे-भरे वनों और पहाड़ियों के बीच स्थित माता झरझरा का पावन स्थल धार्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल बनने की क्षमता रखता है। बरसात के मौसम में पहाड़ियों से बहने वाली जलधारा यहां झरने के रूप में परिवर्तित होकर प्राकृतिक सौंदर्य को और भी निखारती है। हालांकि, ग्रीष्मकाल में जलधारा के सूख जाने से श्रद्धालुओं को झरने का सौंदर्य देखने को नहीं मिलता।

श्रद्धालुओं के अनुसार, 1987 में ग्राम मुरमुरा के निवासी गैंदराम साहू को माता झरझरा के अस्तित्व का आभास हुआ था। इसके बाद उन्होंने ग्राम मुरमुरा और फुलझर के कुछ लोगों के सहयोग से झरझरा माता के स्थल पर पहली बार ज्योत प्रज्वलित की थी। तब से यह स्थल ग्रामीणों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस वर्ष यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि देखी गई है।
ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थल महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि माता झरझरा के साथ माता जतमई भी पहले इसी स्थान पर निवास करती थीं, लेकिन जंगल में लकड़ी बिनने आई महिलाओं की मासिक अशुद्धता के कारण माता जतमई इस स्थान को छोड़कर गायडबरी और कोसमपानी के बीच स्थित पहाड़ी में विराजमान हो गईं। झरझरा स्थल पर माता जतमई के जाने के पदचिन्ह आज भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
-इसके अतिरिक्त, यहां एक प्राचीन शिलालेख भी मौजूद है, जिस पर लिखी भाषा अभी तक अज्ञात है। यदि पुरातत्व विभाग इस शिलालेख का अध्ययन करे, तो इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
पर्यटन विभाग यदि इस ओर ध्यान दे, तो झरझरा स्थल को एक प्रमुख धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे क्षेत्र के विकास के साथ-साथ स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
