कवर्धा: ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए हर साल करोड़ों रुपए खर्च होते हैं. योजनाओं का मकसद होता है गरीब बच्चे पढ़-लिखकर समाज, गांव और परिवार का नाम रोशन करें . वहीं मां-बाप का सपना होता है कि बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल कर अपने जीवन में सफल हो जाए. लेकिन सरकार की योजनाओं को उनका तंत्र ही फेल करने में जब जुटा हो तो सपने टूटने लाजिमी है.ऐसा ही एक मामला कबीरधाम जिले में देखने को मिला.

डेढ़ साल से एक कमरे में स्कूल : कबीरधाम जिला मुख्यालय से लगे घुघरी अटल आवास के पास एक सरकारी स्कूल है. इस स्कूल में कक्षा पहली से पांचवीं तक 40 छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं. हालांकि इस स्कूल को पिछले डेढ़ साल से वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में संचालित किया जा रहा है. इसका मुख्य स्कूल 2 किलोमीटर दूर नगर के अंदर शक्तिपारा वार्ड में संचालित हैं. दूरी के वजह से बच्चों को स्कूल आने-जाने में दिक्कत ना हो इसलिए इस स्कूल को संचालित किया जा रहा है.लेकिन इस स्कूल को संचालित करने का फैसला लेने वाले अफसरों ने ये तक जानने की जहमत नहीं उठाई कि स्कूल की हालत क्या है और यहां तक बच्चे कैसे पहुंचेंगे.
शौच लगे तो घर जाओ, गर्मी लगे तो किताब हिलाओ
सिटी बस डिपो के कमरे को बनाया स्कूल : जिस जगह पर स्कूल संचालित किया जा रहा है वहां पहले सीटी बस डिपो था.लेकिन अब यहां पर सिटी बस का संचालन बंद है.इसलिए जो भवन था वो खंडहर में बदल चुका है. सिर्फ कबाड़ में तब्दील हो चुकी बसें ही यहां पर खड़ी हैं. इसी भवन के एक कमरे में पहली से पांचवीं तक कक्षाएं संचालित की जा रहीं हैं.इस काम चलाउ भवन में ना तो शौचालय है, ना बिजली और ना ही पीने के पानी की व्यवस्था.
शौच लगे तो घर जाओ, गर्मी लगे तो किताब हिलाओ : बच्चों को यदि प्यास लगती है तो पाइप लाइन की लीकेज से रिसने वाले पानी को अपने हथेलियों में इकट्ठा करके प्यास बुझाते हैं.जिन बच्चों को शौच लगती है तो स्कूल की पढ़ाई छोड़कर उन्हें अपने घर जाना होता है. भीषण गर्मी से बेहाल बच्चे पढ़ाई के दौरान अपनी किताबों को पंखा बनाकर थोड़ी राहत की हवा खुद से लेते हैं.इतना सब तो ठीक है,लेकिन स्कूल के आसपास इतने पेड़ पौधे और जंगल है कि सांप बिच्छू का खतरा हर समय मंडराते रहता है. बच्चों का कहना है कि स्कूल में बहुत गर्मी लगता है शौच के लिए घर जाना पड़ता है. स्कूल कमरे में लगा दरवाजा भी टूट गया है. जिसके कारण बहुत समस्या होती है, टीचर को बोलने पर भी कोई व्यवस्था नही होती.

जब हमने शिक्षकों से स्कूल की दुर्दशा पर बात की तो उन्होंने बताया स्कूल में ना तो बच्चों और शिक्षकों के लिए शौचालय की व्यवस्था है और ना ही बच्चों के खेलने कुदने के लिए जगह. बस इस एक कमरे में बच्चों को अलग-अलग कक्षाओं के अनुसार अलग दिशाओं में बैठाकर पढ़ाया जाता है.
सांप-बिच्छू आए दिन निकलते हैं. सामने कबाड़नुमा बस पत्थर के सहारे खड़ा हुआ है. जहां बच्चे खेलते हैं जिससे दुर्घटना का खतरा बना रहता है. कैंपस में अंदर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है.नशाखोरी करते हैं मना करने पर विवाद करने लगते हैं. कई बार उच्चाधिकारियों को स्थिति को अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया – शिक्षक
मामले को लेकर जब हमने जिला शिक्षा अधिकारी एफआर वर्मा से बात कि तो उन्होंने जल्द ही भवन का इंतजाम करने की बात कही है.

आप लोगों के माध्यम से मुझे इस संबंध में जानकारी हुई है. मैं पता किया हूं उसका मुख्य स्कूल शक्ति पारा वार्ड में संचालित हैं. वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में संचालित किया जा रहा है. हम शासन को नई स्कूल भवन के लिए प्रस्ताव बनाकर भेजेंगे ताकि बच्चों को अच्छी व्यवस्था वाला स्कूल भवन मिल सके- एफआर वर्मा, डीईओ
ईटीवी भारत की रिपोर्ट के बाद जिम्मेदारों ने नए भवन की बात कही है. लेकिन क्या बच्चों को वक्त पर नया भवन मिलेगा,ये अब भी एक बड़ा सवाल है.क्योंकि जिस प्रस्ताव को बनाकर भेजने की बात जिम्मेदार अधिकारी ने कही है,वो प्रस्ताव भी इसी सिस्टम से होकर गुजरेगा.
