नारायणपुर: जिस इलाके में कभी नक्सलियों की जन अदालत लगती थी, वहां अब बच्चों की क्लास लग रही है. नारायणपुर का वो ‘अबूझमाड़’, जहां सड़कें तो दूर पगडंडियां भी दहशत के साये में दम तोड़ देती थीं. उन रास्तों को पार कर ना सिर्फ DEO एक गांव पहुंचे बल्कि मानो पूरा स्कूल ही बच्चों के पास पहुंचा.

कोड़ेनार के घोटुल में ‘क्लास’
नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर अबूझमाड़ के दूरस्थ गांव कोड़ेनार में 25 फरवरी 2026 को इतिहास बना. आजादी के बाद पहली बार यहां क्लास लगी. स्कूल भवन नहीं होने पर समाज के रिति-रिवाजों के लिए काम आने वाले घोटुल में बच्चों ने पहली बार ब्लैकबोर्ड देखा.
कोड़ेनार गांव पहाड़ियों और नालों को पार कर बसा है. ग्राम पंचायत कच्चापाल के इस छोटे से आश्रित गांव में सिर्फ 14 परिवार रहते हैं. बरसात के मौसम में यह इलाका पूरी तरह कट जाता है. यहां के बच्चों को अगर पढ़ना होता तो 7 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. घने जंगल, जंगली जानवर और नक्सल प्रभाव के कारण यह सफर बेहद जोखिम भरा था. इसी वजह से 6 साल से ऊपर के 25 बच्चों ने कभी ब्लैकबोर्ड तक नहीं देखा था.
कोड़ेनार में स्कूल खोलना सिर्फ प्रशासनिक काम नहीं था, यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी थी. हम चाहते हैं कि अबूझमाड़ का हर बच्चा कलम पकड़े. यह विकास की नई शुरुआत है.- कलेक्टर नम्रता जैन
प्रशासन का फैसला: स्कूल बच्चों के पास जाएगा
जब जिला प्रशासन की टीम यहां पहुंची तो हालात देखकर बड़ा फैसला लिया गया कि अब बच्चे स्कूल नहीं जाएंगे, बल्कि स्कूल गांव में खुलेगा. 25 फरवरी 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी अशोक कुमार पटेल और जनपद पंचायत ओरछा के उपाध्यक्ष मंगडूराम नूरेटी गांव पहुंचे. उनके साथ रंग-बिरंगी किताबें, नए स्कूल बैग और यूनिफॉर्म थे.
कई वर्षों तक इस क्षेत्र में नक्सलवाद का साया रहा. लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. जब बच्चों ने हमारे हाथों से किताबें लेकर सिर पर रखीं, वह पल मेरे जीवन का सबसे भावुक क्षण था.- जनपद उपाध्यक्ष मंगडूराम नूरेटी
त्यौहार से कम नहीं था माहौल
गांव में पहली बार राष्ट्रगान गूंजा. पहली बार स्कूल ड्रेस पहनकर बच्चे कतार में खड़े हुए. माहौल किसी त्योहार से कम नहीं था. बच्चों को निशुल्क गणवेश, स्कूल बैग और किताबें मिलीं. नियमित शिक्षक की नियुक्ति की गई. प्रशासन ने सुनिश्चित किया कि एक शिक्षक रोज इस दुर्गम रास्ते को तय कर बच्चों को पढ़ाएगा.
गांव के युवा राजू ने कहा कि हमने अपनी जिंदगी अंधेरे में बिताई, लेकिन अब हमारे बच्चों का भविष्य उजाला होगा. जहां शिक्षा पहुंचती है, वहां बंदूकें खामोश हो जाती हैं.” कोड़ेनार का यह छोटा सा स्कूल सिर्फ एक भवन नहीं है, बल्कि यह विश्वास की नई शुरुआत है.x
