रायपुर: 23 अप्रैल को पंडित माधवराव सप्रे की पुण्यतिथि मनाई जाती है. वे एक प्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार और राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत थे. उन्हें मूर्धन्य पत्रकार के रूप में भी जाना जाता है और उन्होंने ना सिर्फ छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ भी अपनी कलम मुखर होकर चलाई.

पत्रकारिता और साहित्य में योगदान
पंडित माधवराव सप्रे ने 1 जनवरी 1900 को पेंड्रारोड से “छत्तीसगढ़ मित्र” नामक मासिक पत्रिका शुरू की थी. यह क्षेत्र की पहली महत्वपूर्ण हिंदी पत्रिकाओं में से एक थी. अपने लेखों में वे अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर लिखते थे, जिसके कारण उन पर राजद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया और उन्हें जेल जाना पड़ा.
सप्रे जी ने बिलासपुर, रायपुर, इलाहाबाद और बनारस जैसे स्थानों पर अध्ययन किया. 1905 में बनारस में उनकी मुलाकात बाल गंगाधर तिलक से हुई, जिनकी विचारधारा से वे गहराई से प्रभावित हुए. बाद में उन्होंने “हिंदी केसरी” पत्रिका के प्रकाशन में भी योगदान दिया.
जेल के बाद का जीवन
इतिहासकार डॉक्टर रमेंद्रनाथ मिश्र बताते हैं कि सप्रे जी ने जेल से बाहर आने के बाद साधु जीवन अपनाया और रायपुर के मठ में रहकर साहित्य कार्य किया. उन्होंने मराठी ग्रंथ “रामदास बोध” का हिंदी अनुवाद किया और तिलक जी के “गीता रहस्य” का भी हिंदी रूपांतरण किया. इससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली.
सामाजिक और राष्ट्रीय योगदान
सप्रे जी ने रायपुर में आनंद समाज वाचनालय की स्थापना की, जो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान युवाओं में राष्ट्रीय चेतना फैलाने का केंद्र बना. यहां महात्मा गांधी ने भी अपने प्रवास के दौरान भाषण दिया था.
साहित्यकारों के प्रेरणास्रोत
उनके समय के कई बड़े साहित्यकार जैसे सुभद्रा कुमारी चौहान और सेठ गोविंद दास उन्हें मार्गदर्शक मानते थे. उनके सहयोगी मावली प्रसाद श्रीवास्तव भी एक प्रसिद्ध साहित्यकार थे.
निधन और विरासत
पंडित माधवराव सप्रे का निधन 23 अप्रैल 1926 को रायपुर में हुआ. उनका जीवन साहित्य, पत्रकारिता और राष्ट्रसेवा का अद्भुत उदाहरण है. आज भी वे छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के गौरव पुरुष के रूप में याद किए जाते हैं.
