असमय संविधान सभा की अध्यक्षता प्रसिद्ध शिक्षाविद् और एकीकृत बंगाल के बड़े इसाई नेता, अल्पसंख्यक अधिकार समिति के अध्यक्ष और संविधान सभा के उपाध्यक्ष डॉ. हरेन्द्र कुमार मुखर्जी कर रहे थे। इस समय के. एम. मुंशी जी ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए यह तर्क दिया कि हम एक प्रगतिशील समाज का हिस्सा हैं और ऐसे में धार्मिक क्रियाकलापों में हस्तक्षेप किये बिना हमें देश को एकीकृत करना चाहिए। बीते कुछ वर्षो में धार्मिक क्रियाकलाप में जीवन के सभी क्षेत्रों को अपने दायरे में ले लिया है और हमें ऐसा करने से रोकना होगा और मैं यह कहना चाहूंगा कि जितनी जल्दी हम जीवन के अलगाववादी दृष्टिकोण को भूल जाएं उतना देश और समाज के लिए अच्छा होगा। धर्म को केवल उसी परिधि तक सीमित होना चाहिए जो नियमत: धर्म की तरह दिखता है और शेष जीवन को विनियमित, एकीकृत और संशोधित होना चाहिए। अत: राष्ट्र की एकता के लिए यह एक अहम् विषय है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने यह स्पष्ट कहा था कि हमें व्यवहारिक रूप से इस देश में एक सिविल संहिता लागू करनी चाहिए और हमें इसे संविधान का एक आवश्यक भाग बनाकर एक सकारात्मक बदलाव लाना चाहिए। हम धर्म को इतना विस्तृत और व्यापक क्यों कर रहे हैं कि वह संपूर्ण जीवन पर ही कब्जा कर ले। संविधान सभा में उस समय इस प्रस्ताव पर 03 संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किये गये तथा यह भी कहा गया कि यह प्रावधान अनुच्छेद 25 का उल्लंघन करते हैं। किंतु इन सारे संशोधन प्रस्तावों को अस्वीकर करते हुए इसे नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा बना दिया गया।
वर्ष 2016 में विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता से संबंधित कुछ सवाल लोगों से पूछे थे। जिस आधार पर आयोग का यह कथन था कि निजी मामलों को समान नागरिक संहिता का मुद्दा न बनाया जाय एवं ये प्रावधान इस तरह हो कि वे मानव अधिकारों का उल्लंघन न करें। आयोग का यह भी मानना है कि निजी कानूनों के फर्क से भेदभाव उत्पन्न नहीं होता बल्कि लोकतंत्र को मजबूती प्रदान होती है। आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि समान नागरिकता को लागू करने के बजाय निजी कानूनों को संहिताबद्ध किया जाय, इससे हम अनुच्छेद 25 का सम्मान करते हुए एक उत्कृष्ट कानून का निर्माण कर सकेंगे।
वर्ष 1985 में शाहबानो के प्रकरण में देश की शीर्ष अदालत ने यह कहा कि यह अत्यंत ही दुख का विषय है कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 44 मूल अक्षर बनकर रह गया है परंतु सरकार जमीनी स्तर पर इसे लागू करने का कोई प्रयास नहीं कर रही है। वहीं सन् 1995 में सरला मुद्गल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत व्यक्त की गई संविधान निर्माताओं की इच्छा को पूरा करने में सरकार कितना समय लेगी। सन् 2003 के जॉन बलवत्तम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह विषय अत्यंत ही दुखद है कि सरकार ने अभी तक एक समान सिविल संहिता को लागू नहीं किया है। वही वर्ष 2017 के शायराबानो के मामले में न्यायालय ने कहा कि हम सरकार को निर्देशित करते हैं कि इस विषय पर उचित विधान बनाने पर विचार करे ताकि वैचारिक मतभेदों को दूर करते हुए देश की एकता और अखंडता को मजबूत किया जा सके।
संविधान निर्माण के बाद से ही समान नागरिक संहिता को लागू करने को लेकर लगातार मांग उठती रही है लेकिन जितनी बार मांग उठी उतनी बार इसका विरोध किया गया, परंतु महिलाओं के मामलों में हो रहे भेदभाव एवं अधिकारों के हनन से यह बात स्पष्ट होती है कि इसे लागू न किये जाने से न केवल लैंगिक समानता को खतरा है बल्कि सामाजिक समानता भी हमसे कोसो दूर है। वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदाय के हिमायती अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए समान नागरिक संहिता का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। कुछ धर्मो के लिए वह उनकी आस्था का विषय बन चुका है तथा उन्हें इस बात की चिंता है कि समान नागरिक संहिता की आड़ में उनकी धार्मिक आजादी को छीना जा रहा है।
बहरहाल सरकार को यह चाहिए कि वह न्यायालय के निर्णयों का सम्मान करते हुए तथा निजी मामलों के सभी पहलुओं पर विचार करते हुए विवाह, तलाक, संपत्ति आदि के विषय पर मजहब की भावनाओं को ठेस पहुंचाये बिना कानून निर्माण का प्रयास करे। मौजूदा वक्त में गोवा एक अकेला ऐसा राज्य है जहॉं पर समान नागरिक संहिता लागू है। जाहिर है उसके लिए भी कई प्रयास किये गये होंगे। इसीलिए आवश्यक है कि संविधान निर्माताओं के भावनाओं का ख्याल रखते हुए सरकार जल्द से जल्द समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए एक ठोस कदम उठाये।

