
947 में ब्रितानी हुकूमत से आजादी मिलने के बाद पहली बार 1951-52 में भारत में आम चुनाव हुए। यह चुनाव सिर्फ इसलिए बेहद अहम नहीं था कि यह ऐतिहासिक चुनाव था, स्वतंत्र भारत का पहला चुनाव था बल्कि इसलिए भी अहम था कि सारी दुनिया की निगाह इस पर टिकी थी। सबके मन में यह सवाल था कि नया-नया आजाद हुआ भारत क्या लोकतंत्र की इतनी बड़ी कवायद को सफलतापूर्वक अंजाम दे पाएगा। लोकसभा के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं के भी चुनाव होने थे। मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन के कुशल नेतृत्व में जब चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हुए तो दुनिया हैरान रह गई।
भारत के पहले चुनाव में करीब 1,874 प्रत्याशी और 53 राजनीतिक पार्टियां मैदान में थीं, इनमें से 14 राष्ट्रीय पार्टियां थीं. इनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा सहित कई पार्टियां शामिल थीं.
हिमाचल प्रदेश के श्याम सरन नेगी ने आजाद भारत के पहले चुनाव में सबसे पहला वोट डाला था.
आपको जानकर हैरानी होगी कि पहले चुनाव में हर पार्टी के लिए अलग-अलग मतपेटी की व्यवस्था की गई थी. इस पेटी पर उनके चुनाव चिह्न बने थे. तब इस तरह चुनाव कराने के लिए लोहे की दो करोड़ बारह लाख मतपेटियां बनवाई गईं थीं. अगर सिर्फ लोकसभा चुनाव की बात करें तो पहले लोकसभा चुनाव के लिए करीब 17 लाख बैलेट बॉक्स बनवाने पड़े थे. इन्हें गोदरेज कंपनी ने बनाया था. एक बॉक्स के लिए कंपनी ने पांच रुपये लिए थे.
अब हम आपको बताएंगे उस चुनाव के बारे में जो देश के लिए भी नया था और वोट डालने वालों के लिए भी. हम बात कर रहे हैं स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव की. आजादी के बाद हुए भारत के पहले चुनाव में लोकसभा की 497 और अलग-अलग विधानसभाओं की 3,283 सीटों के लिए मतदान हुआ था. तब 17 करोड़ 32 लाख 12 हजार 343 वोटर्स ने रजिस्ट्रेशन कराया, लेकिन सबसे बड़ी हैरानी की बात ये थी कि इनमें से 10 करोड़ 59 लाख लोग पढ़े लिखे नहीं थे. पर इन्होंने बढ़चढ़कर चुनाव में भाग लिया. ये चुनाव करीब 4 महीने (25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952) में संपन्न हुए.
किसान मजदूर प्रजा पार्टी ने 9, हिंदू महासभा ने 4 और भारतीय जनसंघ व रिवलूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को 3-3 सीटों पर जीत हासिल हुई। पहले आम चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर करीब 45 प्रतिशत रहा। कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा वोट शेयर निर्दलियों का रहा, जिन्हें कुल 16 प्रतिशत वोट मिले। सोशलिस्ट पार्टी को 10.59, सीपीआई को 3.29 और भारतीय जन संघ को 3.06 प्रतिशत वोट मिले। चुनाव बाद जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस की प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनी।
![]()
कई दिग्गज हार गए चुनाव
देश के पहले ही आम चुनाव में कई दिग्गजों को हार का मुंह देखना पड़ा। देश के पहले कानून मंत्री डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को बॉम्बे (नॉर्थ सेन्ट्रल) सीट पर कभी अपने ही सहयोगी रहे एन. एस. कर्जोलकर के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी। आंबेडकर के अलावा किसान मजदूर प्रजा पार्टी के कद्दावर नेता आचार्य कृपलानी भी चुनाव हार गए।
चुनौतियां
एक ऐसा देश जहां औसतन हर 10 में बमुश्किल 2 लोग भी शिक्षित नहीं थे, वहां सफलतापूर्वक चुनाव कराना टेढ़ी खीर थी। 21 साल या उससे ऊपर के सभी महिला-पुरुषों को मताधिकार था। घर-घर जाकर 17.3 करोड़ वोटरों को पंजीकृत करना ही अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण था। ऐसी भी महिलाएं थीं, जो नाम पूछने पर अपना परिचय फलां की पत्नी या फलां की मां के तौर पर देती थीं।
आंबेडकर ने कांग्रेस छोड़कर शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का गठन किया था और बॉम्बे (नॉर्थ सेन्ट्रल) की सुरक्षित सीट से ताल ठोका था। उन्हें 1,23,576 वोट मिले और कांग्रेस के कजरोलकर ने 1,38,137 वोट हासिल कर जीत हासिल की। उसके बाद आंबेडकर राज्यसभा के जरिए संसद में पहुंचे। 1954 में जब भंडारा लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव हुए तो आंबेडकर ने यहां भी ताल ठोका लेकिन एक बार फिर उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार से शिकस्त झेलनी पड़ी।
कांग्रेस की एकतरफा जीत
प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की अगुआई में कांग्रेस ने इन चुनावों में एकतरफा जीत हासिल की। फूलपुर लोकसभा सीट से जवाहर लाल नेहरू ने विशाल अंतर से जीत हासिल की। साधारण बहुमत के लिए 245 सीटों की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस ने कुल 489 सीटों में से 364 पर अपना परचम लहराया। दूसरे नंबर पर सीपीआई रही, जिसके खाते में 16 सीटें आईं। 12 सीटों के साथ सोशलिस्ट पार्टी तीसरे स्थान पर रही।
पहले आम चुनाव के परिणाम
![]()
पहले चुनाव में जीते 3 नेता बाद में प्रधानमंत्री बने
देश के पहले आम चुनाव के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। उनके अलावा 2 ऐसे नेता भी चुनाव जीते जो आगे चलकर भारत के प्रधानमंत्री बने, ये थे- गुलजारी लाल नंदा और लाल बहादुर शास्त्री।

