
( दंडकारण्य ) प्रवास में बिताए गए समय की गाथा को यहां की लोकभाषा में ढालते हुए राम चालीसा लिखी। इसके साथ ही रामचरितमानस की कथा को भी हल्बी में सारांश में वर्णन किया है…

बस्तर के साहित्य ऋषि लाला जगदलपुरी ने पांच दशक पूर्व राम-चालीसा की रचना कर दी थी। बताया जा रहा है कि लाला जी ने श्रीराम के बस्तर ( दंडकारण्य ) प्रवास में बिताए गए समय की गाथा को यहां की लोकभाषा में ढालते हुए राम चालीसा लिखी। इसके साथ ही रामचरितमानस की कथा को भी हल्बी में सारांश में वर्णन किया है। यह रचना रामकथा के नाम से भोपाल से प्रकाशित भी हो चुकी है।
इन दोनों रचनाओं की प्रतियां अब नजर ही नहीं आती हैं। इन्हें उनके परिवार ने अमूल्य धरोहर के तौर पर संभालकर रखा हुआ है। उनके भतीजे विनय श्रीवास्तव ने बताया कि वे इन दोनों रचनाओं के अलावा उनकी लिखी अन्य साहित्यिक रचनाओं का पुनप्र्रकाशन अब नई दिल्ली के नेशनल बुक ट्रस्ट से करवाने प्रयासरत हैं। जल्द ही इस सिलसिले में प्रकाशन समूह से बात करने की जानकारी उन्होंने दी है।
सचित्र रामकथा में रामजन्म से लेकर रावण वध तक का वर्णन
बस्तर के इतिहास को लेकर शोध करने वाले डा हीरालाल शुक्ल की लिखी रामकथा का लाला जगदलपुरी ने हल्बी में अनुवाद किया हुआ है। 104 पन्नों में सिमटी इस रामकथा में 21 अध्याय का संकलन् है। इसमें रामजनम, रामबिहाव, दुय वरदान, रामबनवास जैसे अध्याय के साथ ही लड़ई, नांगफांलाले मुकति, मेघनाथ बध, रावन वध जैसे अध्याय हैं। हल्बी में इन कथाओं को पढऩा अपने आप में अद्भूत लगता है। इन अध्याय के साथ ही इसमें रेखांकन के माध्यम से कथा का चित्रण भी नजर आता है।
