छत्तीसगढ़, प्रदेश के कई जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल- बेहाल है। राजधानी रायपुर से जुड़े ज़िलों में कहीं झोलाछाप डाक्टर बन कर इलाज कर रहे हैं तो कहीं आर्ट्स और कामर्स पढ़ रहे नवयुवक मेडिकल स्टोर्स में बैठ कर दवाई दे रहे हैं और तो और लैब तकनीशियन जो फर्ज़ी संस्थानों से डिग्री डिप्लोमा खरीद कर अपनी दुकानों और घरों में जांच करने वाली मशीनों को लगाकर ना सिर्फ ब्लड यूरिन सहित कई जांच कर रहे बल्कि खुद ही दवाई भी दे रहे हैं। राजधानी से 100-150 किलोमीटर की परिधि में आने वाले इन जिलों में ये हाल है तो सूदूरवर्ती क्षेत्रों और वनांचलों में कितनी दयनीय स्थिति होगी इसका आकलन करना भी मुश्किल है। अक्सर ही बस्तर सहित कई वनांचल क्षेत्रों से खाट-खटिया में मरीजों और गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने की तस्वीरें और समाचार आते ही रहते हैं।
कबीरधाम जिले के सूदूरवर्ती और वनांचल क्षेत्रों सहित विकासखंड मुख्यालयो में भी झोलाछाप और गैर एम.बी.बी.एस.डिग्रीधारी शासन से बगैर अनुमति प्राप्त नर्सिंग होम संचालित कर रहें हैं। यहां 10 से 20 बिस्तरों को लगा कर धड़ल्ले से सभी बिमारियों का इलाज किया जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण यह है की शासन ने छत्तीसगढ़ नर्सिंग होम एक्ट 2010 और संशोधन 2013 में विस्तृत रूप से नर्सिंग होम, मल्टीस्पेशलिटी और सुपरस्पेशलिटी अस्पतालो के संचालक के लिए कड़े मापदंड तय किये है। इसके बावजूद प्रशासनिक लापारवाही की वजह से इन अस्पतालों का संचालन जारी है। इन क्षेत्रों के निवासियों की स्वास्थ्य सेवाओं और क्वालिफिकेशन संबंधित जानकारी ना होने का फायदा ये डॉक्टर बन कर भरपूर रुप से उठा रहे हैं। इनके इस कृत्य की वजह से ना सिर्फ सही जांच और ईलाज हो पा रहा है बल्कि आर्थिक और मानसिक रूप से भी मरीज और उनके परिजन प्रताड़ित हो रहें हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जहां डॉक्टरों को धरती में भगवान का रूप माना जाता है वहां ये फर्जी, झोलाछाप और गैर एम.बी.बी.एस. डिग्री धारी सिर्फ पैसा कमाने के लिए भोले भाले आदिवासीयों और आमजनों को लूट रहे हैं। किसी भी बिमारियों में ये अपने तथाकथित अस्पताल में भर्ती कर सीधे ग्लूकोज और अन्य दवाओं की स्लाइन चढ़ा देते हैं। केस के बिगड़ते ही ये इन मरीजों को जिला अस्पताल या बड़े अस्पतालों में रेफर कर देते हैं। समय के अभाव, उचित वाहन व्यवस्था और दूरी की वजह से इन मरीजों की मृत्यु तक हो जाती है। इन अस्पतालों में माइनर ओ.टी. की भी व्यवस्था है ताकि छोटे-मोटे आपरेशन को ये खुद ही कर के मामले को निपटा लेते हैं और हरसंभव प्रयास करते हैं कि उनसे जुड़ा हुआ कोई मरीज कहीं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला चिकित्सालय या विशेषज्ञ चिकित्सकों के पास ना चले जाए। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस क्षेत्र के आदिवासी और संरक्षित जनजातियों में शिक्षा की अभाव की वजह से समुचित एलोपैथिक चिकित्सा की जानकारी ना होने की वजह इस चिकित्सा पद्धति में विश्वास नहीं है और ये अपने क्षेत्र में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। अमरकंटक से जुड़े होने सहित ये पूरा क्षेत्र वनों से आच्छादित है जिसमें कई प्रकार के औषधीय गुण वाले वनस्पति पाईं जाती है इन आदिवासियों का इन पर ज्यादा विश्वास होता है। अत्यधिक रुप से बिमारी की वजह से ही ये अस्पतालों का रुख़ करते हैं और इन लोगों के चंगुल में फंस जाते हैं। क्योंकि ये सभी भी इन इलाकों या आसपास के क्षेत्रों के ही रहवासी है इसलिए परिचित होते हैं और इन पर आंख मूंद कर भरोसा कर इलाज कराने लगते हैं। इसमें शासकीय अस्पतालों के वार्ड बॉय और ड्रेसर भी इनका सहयोग करते हैं ताकि इनसे कुछ आर्थिक लाभ प्राप्त हो जायें। इन अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ भी बगैर ड्रिग्री और डिप्लोमा भी धारी हैं। शासन की नर्सिंग स्टाफ के सहयोग के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण के माध्यम से योजनाएं चला कर नवयुवक और नवयुवतियों को प्रशिक्षण प्रदान कर रही है जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया जा सके। पंरतु अधिकांश जगहों पर ये अपने प्रशिक्षण के आधार पर इलाज और पूर्णकालिक नर्सिंग स्टाफ के रूप में भर्ती कर लिये गयें है साथ ही इनके भरोसे मरीजों को छोड़ भी दिया जाता है। बायो मेडिकल वेस्ट के लिए भी केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने कई कठोर नियम बनाए है परंतु इन का भी पालन नहीं किया जा रहा है। कहीं भी खुलें में इन अपशिष्टों को फेंक दिया जाता है जिससे स्वस्थ लोगों और पशु-पक्षियों पर इसका दुष्प्रभाव पडता है। जिस प्रकार उचित ईलाज महत्वपूर्ण है उसी प्रकार बायों मेडिकल वेस्ट का समुचित निष्पादन भी अतिआवश्यक होता है। कुल मिलाकर कबीरधाम जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल-बेहाल है। शासन स्तर पर या प्रशासनिक रुप से स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं ये देखनेवाली बात होगी ……..


