धमतरी: जो बच्चे बोल और सुन नहीं सकते उनको बेहतर शिक्षा देने का संकल्प शिक्षा विभाग ने उठाया. ऐसे बच्चों को बेहतर शिक्षा मुहैया कराने के लिए धमतरी में श्रवण बाधित बालिका विद्यालय की शुरुआत की गई. मकसद साफ था सबको समान शिक्षा का अवसर देना और उनका भविष्य संवारना. इसी मकसद को पूरा करने के लिए साल 2005 में इस स्कूल की स्थापना की गई. स्थापना के पहले ही दिन से ये स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है. आज 20 साल बाद भी हालात जस के तस हैं. आज भी स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहा है.
20 साल बाद नहीं बदले हालात: छत्तीसगढ़ शासन ने ”बेटी बचाबो, बेटी पढ़ाबो” का नारा दिया है. पर जिस तरह से यहां स्कूल में शिक्षकों की कमी पिछले 20 सालों से बरकरार है उससे कई सवाल भी खड़े होने लगे हैं. ऐसा नहीं है कि शिक्षा विभाग को शिक्षकों की कमी की जानकारी नहीं है. जानकारी होने के बावजूद शिक्षकों की कमी आज तक दूर नहीं हो पाई है. ऐसे में यहां पढ़ने वाली दिव्यांग बेटियां अब अपने साइन लैग्वेज में पूछ रही हैं ”ऐसे पढ़ेंगे तो कैसे बढ़ेंगे”.
श्रवण बाधित बालिका विद्यालय धमतरी
पहले किराए के भवन में शुरु हुआ स्कूल: स्कूल की शुरुआत पहले किराए के भवन से हुई. सत्ता में जब भूपेश बघेल की सरकार आई तो उसने बच्चों के लिए बड़ा स्कूल और बेहतनी कैंपस बनवाया. स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए छात्रावास की सुविधा भी शुरु की गई. श्रवण बाधित बालिका विद्यालय में कक्षा 1 से लेकर 10 तक के बच्चे पढ़ते हैं. यहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 97 है. सौ के करीब इन बच्चों को पढ़ाने लिए सिर्फ एक शिक्षक है. जबकी ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए साइन लैंग्वेज के एक्सपर्ट टीचर की जरुरत होती है.
स्कूल में पढ़ते हैं 97 बच्चे: शुरुआत में सिर्फ कक्षा पांच तक चलाने की मंजूरी स्कूल को मिली थी. कक्षा एक से पांच तक के लिए 5 शिक्षकों के पद स्वीकृत थे पर स्कूल को मिले सिर्फ 2 ही शिक्षक. अब इस स्कूल में कक्षा 8वीं तक की पढ़ाई होती है. कक्षा एक से 8 तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए 8 शिक्षकों की व्यवस्था बताई गई. पर वर्तमान में यहां सिर्फ 1 रेग्यूलर टीचर की नियुक्ति है. दफ्तर के कामों को भी मिला लें तो कुल 19 कर्मचारियों के पद यहां स्वीकृत हैं लेकिन स्कूल सिर्फ 5 लोगों के भरोसे चल रहा है. उसमें से भी 1 अधीक्षक हैं और एक रेग्यूलर शिक्षक. बाकी जिनकी नियुक्ति है उसमें रसोइया, चौकीदार और माली जैसे पद हैं. दफ्तर में फाइलों का काम देखने के लिए डेलीवेजेस पर कर्मचारी को रखा गया है.
बना रहता है खतरा: स्कूल जिस इलाके में है वो इलाका रिहायशी इलाकों से थोड़ी दूरी पर है. अक्सर इस इलाके में आसपास के बदमाश और नशेड़ी जमा होते हैं. सन्नाटे और बाहरी खतरे के चलते अधीक्षिका भी यहां बने सरकारी आवास में नहीं रहती हैं. ऐसे में यहां पढ़ने वाले बच्चों पर खतरे की तलवार भी लटकती रहती है. स्कूल अधीक्षिका का कहना है कि हम लगातार शिक्षकों और बाकी जरुरतों के लिए पत्र संबंधित अधिकारी को लिख रहे हैं. शासन की ओर से कब उनकी मांगों को पूरा किया जाता है इसपर कुछ नहीं कहा जा सकता.
श्रवण बाधित छात्रों और स्कूल से जुड़ी बड़ी बातें
ऐसे बच्चों को साइन लैग्वेज के जरिए पढ़ाया जाता है.
वीडियो और चित्रों के माध्यम से बच्चों को सिखाया जाता है.
साइन लैंग्वेज के एक्सपर्ट शिक्षक ऐसे बच्चों को पढ़ाते हैं.
ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल में खास व्ववस्था होती है.








