रायपुर । बिलासपुर हाई कोर्ट ने आरक्षण संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर न करने के मामले को लेकर दायर दो अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई करते हुए राज्यपाल अनुसुइया उईके को नोटिस जारी किया है। याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने राज्यपाल से दो सप्ताह मंे जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 20 फरवरी को होगी।
इधर हाई कोर्ट के नोटिस की सूचना मिलने के बाद राजभवन सचिवालय ने कहा है कि अदालत राज्यपाल को नोटिस जारी नहीं कर सकता है क्योंकि उन्हें संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत छूट प्राप्त है। ज्ञात हो कि राज्य विधानसभा के विश्ोष सत्र में दो दिसंबर 2022 को आरक्षण संशोधन विधेयक पारित किया गया था। इसमेंे आदिवासियों को 32 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 13 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत तथा आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग को चार प्रतिशत आरक्षण का प्रविधान किया गया है।
इस विधेयक पर राज्यपाल ने हस्ताक्षर नहीं किया है। इसे लेकर राज्य की राजनीति लगातार गरमाई हुई है। इस मामले में अधिवक्ता हिमांक सलूजा तथा राज्य सरकार ने दो पृथक पृथक याचिका हाई कोर्ट में दाखिल की थी। सोमवार को जस्टिस रजनी दुबे की कोर्ट में सुनवाई के दौरान शासन की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने तर्क रखा।
सिब्बल ने कहा कि विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद राज्यपाल सिर्फ सहमति या असहमति व्यक्त कर सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल को बिल पर हस्ताक्षर करना चाहिए या फिर असहमति जताते हुए सरकार को वापस लौटा देना चाहिए। संवैधानिक व्यवस्था के तहत राजभवन बिल को राष्ट्रपति के पास भेज सकता है।
राज्यपाल को बिल अपने पास लंबे समय तक रोकने का अधिकार नहीं है। राज्यपाल अपने संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग कर रही हैं। राज्य शासन ने याचिका में कहा है कि आरक्षण के मुद्दे पर राज्यपाल से सहमति लेकर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया। इसमें जनसंख्या के आधार पर प्रदेश में 76 फीसद आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया गया है।
दूसरी याचिका में यह है
अधिवक्ता हिमांक सलूजा ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्यपाल राजनीतिक पार्टी के सदस्य की भूमिका निभा रही हंै। राज्यपाल जिस पार्टी में रही हैं उसके इशारे पर आरक्षण बिल पर हस्ताक्षर नहीं कर रही हैं। याचिका में राज्यपाल अनुसुईया उइके के पिछले राजनीतिक पदोें की भी जानकारी दी गई है।
राष्ट्रपति या राज्यपाल को कोर्ट जारी नहीं कर सकता नोटिस
हाई कोर्ट के नोटिस के बाद राजभवन ने सुप्रीम कोर्ट के मामले का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट राष्ट्रपति या राज्यपाल को नोटिस जारी नहीं कर सकता है। उच्चतम न्यायालय के पांच जजों की संवैधानिक पीठ के न्याय दृष्टांत रामेश्वर प्रसाद व अन्य बनाम यूनियन आफ इंडिया व एक अन्य (2006) 2 एससीसी पेज क्रमांक एक के पैरा 173 में दर्ज लेख के अध्ययन से पता चलता है कि संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल को नोटिस जारी नहीं किया जा सकता है।
वे किसी न्यायालय के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। यह सही है कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता एवं सलाह से कार्य करता है किंतु राज्यपाल द्वारा किए गए कार्यों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। यदि ऐसी कोई चुनौती दी जाती है, तो राज्य सरकार या केंद्रीय सरकार राज्यपाल की प्रतिरक्षा करेगी। न्यायालय राष्ट्रपति या राज्यपाल को कोई शपथ पत्र प्रस्तुत करने का निर्देश नहीं दे सकता है।
हाईकोर्ट के निर्णय के आधार पर ही आरक्षण रुका: डा. रमन सिंह
पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर ही आरक्षण रुका है। 58 प्रतिशत के आरक्षण को हाईकोर्ट ने ही रोका है, फिर तो 76 प्रतिशत कैसे वैध होगा। सवाल इसी में था।
विधेयक पर हस्ताक्षर की उम्मीद: रविंद्र चौबे
राज्य सरकार के प्रवक्ता व मंत्री रविंद्र चौबे ने कहा कि राजभवन को आरक्षण मामले में हाई कोर्ट से नोटिस जारी हुआ है। इससे उम्मीद है कि राज्यपाल विधेयक पर हस्ताक्षर करेंगी।
न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे से बाहर हैं राज्यपाल
राज्यपाल और राष्ट्रपति को न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे से बाहर रखा गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल या किसी राज्य का प्रमुख अपने कार्यालय की शक्तियों और कर्त्तव्यों के पालन और उसके द्वारा किए जाने वाले किसी भी कार्य के लिए किसी न्यायालय में जवाबदेह नहीं होगा। राज्यपाल को किसी भी तरह से पार्टी नहीं बनाया जा सकता है। अनुच्छेद 200 के अनुसार, राज्यपाल यदि किसी विधेयक को अपने पास रोकता है, तो इसे भी न्यायिक पुनर्विलोकन से बाहर रख्ाा गया है।
-अनूप बरनवाल, संविधान विश्ोषज्ञ

