- जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है।
बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच के इस फैसले से हजारों पालकों को राहत मिलेगी जो अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई करा रहे हैं या फिर एडमिशन कराने की सोच रहे हैं। जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें एसोसिएशन ने फीस तय करने के लिए राज्य शासन द्वारा तय किए गए नियमों को चुनौती दी थी। डिवीजन बेंच ने कहा कि राज्य सरकार को पूरा अधिकार है। प्रदेश के भीतर संचालित प्राइवेट स्कूलों की फीस निर्धारण के लिए नियम बनाने व इसे प्रभावी ढंग से लागू कराने की पूरी स्वतंत्रता प्रदेश सरकार को है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने गैर सरकारी विद्यालय शुल्क विनियमन अधिनियम, 2020 और नियम, 2020 बनाते हुए प्राइवेट स्कूलों में फीस निर्धारण का निर्णय लिया था। प्राइवेट स्कूल प्रबंधन द्वारा फीस के नाम पर पालकों से की जा रही मनमाने वसूली की शिकायत के मद्देनजर इस पर नियंत्रण करने नियम बनाने के साथ ही अधिसूचना जारी कर दी थी। राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को चुनौती देते छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन और बिलासपुर प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।राज्य सरकार ने वर्ष 2020 में छत्तीसगढ़ अशासकीय विद्यालय शुल्क विनियमन अधिनियम लागू करने का निर्णय लिया था।
राज्य सरकार के अधिनियम को बताया था स्वयत्तता में हस्तक्षेप-
याचिकाकर्ता प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने अपनी याचिका में राज्य सरकार द्वारा जारी अधिनियम को स्वायत्तता में हस्तक्षेप बताया था। याचिकाकर्ता एसोसिएशन ने फीस तय करने का अधिकार प्रबंधन को देने की मांग की थी। अधिनियम को संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता का अधिकार और 19 (1) (g) व्यवसाय करने की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए अधिनियम को असंवैधानिक बताया था।
राज्य सरकार ने दिया ये तर्क-
राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता कार्यालय के ला अफसरों ने कहा कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में आती है। अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता और न्यायोचित शुल्क तय करना है। ला अफसरों ने इस संंबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला भी दिया।
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि याचिकाकर्ता प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन है, नागरिक नहीं है। लिहाजा अनुच्छेद 19 का हवाला देकर संवैधानिक अधिकारों का हवाला देना उचित नहीं है। बेंच ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य केवल फीस में पारदर्शिता लाना है। कोई अधिनियम केवल इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि उससे किसी को असुविधा हो रही है।
