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रासायनिक खाद के विकल्प में अजोला बन सकता है किसानों की नई उम्मीद

Nkc News Desk June 2, 2026

 

रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच अजोला किसानों के लिए एक प्रभावी जैविक विकल्प बनकर उभर रहा है. यह नाइट्रोजन-समृद्ध जलीय फर्न कृषि, मत्स्यिकी और पशुपालन में उपयोगी है. कम लागत, उच्च पोषण मूल्य और पर्यावरणीय लाभों के कारण अजोला टिकाऊ एवं आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

क्या है अजोला
कृषि वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से 1960 के दशक में हरित क्रांति आई, जिसने भारतीय कृषि व्यवस्था की तस्वीर बदल दी थी. हरित क्रांति में किसानों के बीच अधिक उपज देने वाले उन्नत बीज, सुव्यवस्थित सिंचाई और रासायनिक उर्वरकों के त्रिकोणीय उपयोग का महत्वपूर्ण योगदान रहा. हरित क्रांति ने देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया, जो उस समय प्रत्येक भारतीय नागरिक की दो वक्त की रोटी सुनिश्चित करने की मूलभूत आवश्यकता थी.

रासायनिक उर्वरकों के तौर पर कृषि में मुख्यतः यूरिया, डीएपी, पोटाश का उपयोग किया जाता है. चूँकि कृषि, पशुपालन और मात्स्यिकी बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इसलिए यहाँ के किसान भी इन रासायनिक उर्वरकों पर बड़ी मात्रा में निर्भर हैं. लेकिन लगातार बढ़ती कीमतों और मिट्टी की घटती उर्वरा शक्ति ने आज अन्नदाताओं के सामने गंभीर आर्थिक और कृषि संबंधी संकट उत्पन्न कर दिया है.

वर्तमान में रासायनिक उर्वरक खेती के लिए अनिवार्य आवश्यकता बन चुके हैं, किंतु किसानों में मृदा की पोषक आवश्यकताओं की पर्याप्त जानकारी के अभाव के कारण इनका असंतुलित उपयोग हो रहा है. परिणामस्वरूप इसका प्रतिकूल प्रभाव किसानों की आय, मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरणीय संतुलन तथा उर्वरक की माँग-आपूर्ति शृंखला पर भी स्पष्ट रूप से पड़ रहा है.

भारतीय उर्वरक संघ की वार्षिक रिपोर्ट (2024-25) के अनुसार पोषक तत्वों रासायनिक उर्वरकों (NPK) की खपत 2024-25 के दौरान 32.93 मिलियन मीट्रिक टन थी, जिसमें 2023-24 की तुलना में 7.5% की वृद्धि दर्ज की गई थी. 2024-25 में भारत ने यूरिया, डीएपी/एनपी और एमओपी का आयात क्रमशः 5.65 मिलियन मीट्रिक टन, 4.57 मिलियन मीट्रिक टन, 2.27 मिलियन मीट्रिक टन और 3.54 मिलियन मीट्रिक टन था.

कच्चे माल और तैयार उर्वरकों की अस्थिर अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन और आयात में विकराल संकट पैदा कर रहा है. वर्तमान में पश्चिम एशियाई राष्ट्रों के जंग की तपिश ने भी आयातित रासायनिक उर्वरकों के परिवहन को बुरी तरह प्रभावित किया है. इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ने वाला है. अतः समय पर पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा खेती की बढ़ती लागत की समस्या को कम करने में अजोला जैसे जैविक उर्वरकों का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है.

ऐसे समय में जैविक एवं प्राकृतिक विकल्पों की ओर पुनः उन्मुख होना समय की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है. इन्हीं विकल्पों में “अजोला” एक अत्यंत उपयोगी एवं प्रकृति-प्रदत्त जैव संसाधन है. किंतु जानकारी के अभाव में इसका उपयोग अभी भी केवल कुछ प्रगतिशील किसानों तक ही सीमित रह गया है.

क्या है अजोला?

अजोला एक तैरने वाला जलीय फर्न है, जो विशेष रूप से धान की खेती में नाइट्रोजन की कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसकी पत्तियों की गुहाओं में एक सहजीवी नाइट्रोजन-स्थिरीकरण साइनोबैक्टीरियम (एनाबेना अजोले) मौजूद होता है. यह प्राकृतिक रूप से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ग्रहण करता है और उसे एक ऐसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित करता है जो धान जैसी फसलों के लिए एक शक्तिशाली, टिकाऊ जैव उर्वरक और हरी खाद के रूप में कार्य करता है. इसमें मौजूद सूक्ष्म जीव वातावरण की नाइट्रोजन को अवशोषित की क्षमता के कारण अजोला को “नाइट्रोजन का पावर हाउस” कहा जाता है.

अजोला लगभग हर 5-7 दिनों में अपने बायोमास को दोगुना कर लेता है, जिससे प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष 3-9 टन शुष्क पदार्थ का उत्पादन हो सकता है. अजोला की वृद्धि को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक वायुमंडलीय तापमान, प्रकाश, पोषक तत्व और पानी के पीएच हैं. अजोला वृद्धि के लिए इष्टतम तापमान 20-30 डिग्री सेल्सियस होता है, 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे वृद्धि धीमी हो जाती है और 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रुक जाती है.

अजोला उत्पादन की सरल तकनीक

अजोला उत्पादन के लिए छायादार स्थान में 2×2 मीटर का उथला गड्ढा बनाकर उसमें प्लास्टिक शीट बिछाई जाती है. इसके बाद 10-15 किलोग्राम उपजाऊ मिट्टी, 2-3 किलोग्राम गोबर तथा पानी डालकर लगभग 10-12 सेंटीमीटर जल का स्तर रखा जाता है. फिर 100-500 ग्राम ताजा अजोला डाल दिया जाता है. 7-10 दिनों में अजोला तेजी से फैलकर छानने योग्य हो जाता है. नियमित रूप से पानी और पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने पर निरंतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

कृषि में अजोला का महत्व

अजोला खेतों में जैविक उर्वरक के रूप में कार्य करता है. इसके प्रयोग से रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है. धान की खेती में प्रति एकड़ लगभग 200-300 किलोग्राम ताजा अजोला खेत में डाला जा सकता है. इसे रोपाई के 7-10 दिन बाद खेत में छोड़ा जाता है, जहाँ यह तेजी से फैलकर वातावरणीय नाइट्रोजन को स्थिर करता है. धान के खेतों में अजोला की हरी परत जल वाष्पीकरण की दर घटती है तथा खेतों में नमी लंबे समय तक बनी रहती है. धान के खेतों में अजोला परत पानी के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता कम होती है और किसानों की लागत में भी कमी आती है. इसके अतिरिक्त अजोला खरपतवार नियंत्रण में भी सहायक होता है. यह खेत की सतह पर फैलकर अवांछित खरपतवारों की वृद्धि को रोकता है.

धान के अलावा अजोला का उपयोग गेहूँ, मक्का, सब्जियों एवं बागवानी फसलों में जैविक खाद और मल्च के रूप में किया जाता है. इसे खेतों में हरी खाद की तरह मिलाने से मिट्टी में नाइट्रोजन एवं जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जिससे उर्वरा शक्ति में सुधार होता है. साथ ही यह मिट्टी की ऊपरी सतह पर एक प्राकृतिक आवरण बनाकर नमी को लंबे समय तक बनाए रखता है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता कम होती है. इसके नियमित प्रयोग से फसलों की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन में भी सकारात्मक वृद्धि देखी जाती है. कम लागत में तैयार होने वाला यह जैव उर्वरक छोटे और सीमांत किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है.

मत्स्यिकी में अजोला का उपयोग

मत्स्य पालन क्षेत्र में भी अजोला का काफी महत्व है. इसमें लगभग 20-25 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है, साथ ही कैल्शियम, आयरन एवं विटामिन भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहते हैं. इसके कारण यह मछलियों के लिए उत्तम पूरक आहार माना जाता है. ग्रास कार्प जलीय वनस्पतियों और हरे चारे को पसंद करने वाली एक मछली है. अजोला ग्रास कार्प के लिए अत्यंत उपयुक्त और पौष्टिक प्राकृतिक आहार माना जाता है. साथ ही मछली वाले तालाब में अजोला को नियंत्रित मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक मात्रा में तालाब की सतह ढकने से ऑक्सीजन की कमी हो सकती है.

तालाबों में सीमित मात्रा में अजोला का उपयोग करने से मछलियों की वृद्धि दर बेहतर होती है तथा बाजार से खरीदे जाने वाले महंगे फीड पर निर्भरता कम होती है. ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे मत्स्य पालकों के लिए यह कम लागत वाला पोषक आहार एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है. इससे मत्स्य उत्पादन की लागत घटेगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी.

पशुपालन में अजोला की उपयोगिता

पशुपालन के क्षेत्र में अजोला “हरित चारा” के रूप में अत्यंत उपयोगी है. इसमें उपस्थित पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, खनिज लवण एवं विटामिन के कारण गाय, भैंस, बकरी, सूअर तथा मुर्गी पालन में इसे पूरक आहार के रूप में उपयोग किया जा सकता है. पशुओं को नियमित रूप से अजोला खिलाने से दूध उत्पादन में 10-20% वृद्धि होती है तथा पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है. मुर्गी पालन में इसके उपयोग से अंडों की गुणवत्ता में सुधार देखा गया है. चारे की बढ़ती कीमतों के बीच अजोला पशुपालकों के लिए सस्ता और पौष्टिक विकल्प बन सकता है.

आवश्यकता है जागरूकता की

इतनी उपयोगी जैविक तकनीक होने के बावजूद अजोला का उपयोग अभी भी कुछ प्रगतिशील किसानों तक ही सीमित है. जानकारी और प्रशिक्षण के अभाव में अधिकांश किसान इसके लाभों से अनजान हैं. ग्रमीण स्तर पर इसकी उपयोगिता पर जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है, जो कृषि विशेषज्ञों द्वारा ‘संतुलित उर्वरक उपयोग अभियान’ द्वारा किसानों के बीच किया जा रहा है . यदि किसानों को अजोला उत्पादन की सरल तकनीक, इसके पोषण मूल्य और आर्थिक लाभ के बारे में प्रशिक्षित किया जाए, तो यह कृषि, मत्स्यिकी और पशुपालन तीनों क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है.

आज जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता संकट का रूप ले रही है, तब अजोला जैसे प्राकृतिक विकल्प किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर सकता है . आवश्यकता है केवल इसे खेत-खलिहान और गाँव-गाँव तक पहुँचाने की. यदि सही नीति, प्रशिक्षण और जागरूकता के साथ इसका प्रसार किया जाए, तो अजोला आत्मनिर्भर और टिकाऊ कृषि व्यवस्था की नींव मजबूत करने में महत्वपर्ण भूमिका निभाएगा.

Tags: अजोला किसानों की नई उम्मीद रासायनिक खाद

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