- एक ही प्रोजेक्ट है, हर जमीन पर चाहिए एक समान मुआवजा,
- ग्रामीणों ने एसडीएम घरघोड़ा को दिया ज्ञापन, नीतिगत खामी का नुकसान ग्रामीणों को, आंदोलन की दी चेतावनी
रायगढ़। एसईसीएल का बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट पेलमा जनसुनवाई के पहले ही विवादों में घिर गया है। प्रभावित गांवों के ग्रामीणों ने बेहद गंभीर बिंदु पर आपत्ति दर्ज कराई है। इस पर प्रशासन भी निरुत्तर है। 19 मई को जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों ने कहा है कि जब सभी गांवों की जमीन एक ही प्रोजेक्ट में ली जा रही है लेकिन हर गांव में जमीनों की दरें अलग-अलग हैं। इससे मुआवजे में असमानता है। सभी को एक समान मुआवजा मिलना चाहिए।सरकार जमीन रजिस्ट्री से मिलने वाले राजस्व को ध्यान में रखकर गाइडलाइन दरें तय करती है।

जब किसी प्रोजेक्ट के लिए भू-अर्जन होता है तो उसी हिसाब से मुआवजा आकलन होता है। मतलब एक ही प्रोजेक्ट में ली जा रही जमीनों की दरें अलग-अलग होने से मुआवजा भी कम-ज्यादा होता है। पेलमा कोल ब्लॉक का आवंटन एसईसीएल को किया गया है। यह एसईसीएल की सबसे बड़ी कोयला परियोजना है। एसईसीएल ने पेलमा कोयला खदान का एमडीओ अडाणी इंटरप्राइजेस को सौंप दिया है। मतलब भू-अर्जन से लेकर कोयला उत्पादन तक सारा काम अडाणी को करना है। प्रभावित गांव हिंझर और जरीडीह के किसानों ने एसडीएम घरघोड़ा से मिलकर विरोध दर्ज करा दिया है।
उनका कहना है कि पेलमा, उरबा, हिंझर, जरीडीह, लालपुर, मडवाडूमर, सक्ता और मिलूपारा में जमीनों के रेट अलग-अलग हैं। पेलमा, उरबा और मिलूपारा की दर बहुत ज्यादा है तो अन्य गांवों का बहुत कम है। इस वजह से आठों गांवों में मुआवजा अलग-अलग बन रहा है। जब एक ही प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहण हो रहा है, सभी की जमीन के नीचे एक जैसा कोयला है, तो किसी को कम और किसी को ज्यादा राशि क्यों दी जा रही है। सालों से किसान अपनी जमीन पर खेती करके जीवन-यापन कर रहा है। अब वहां से विस्थापित होना है, तो पुनर्वास के तहत ज्यादा से ज्यादा लाभ मिलना चाहिए।
मिलूपारा के रेट से मिले सबको मुआवजा
ग्रामीणों का कहना है कि जब तक मुआवजा निर्धारण को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया जाता तब तक जनसुनवाई को स्थगित करना चाहिए। साथ ही उनकी मांग है कि सभी गांवों में मिलूपारा का रेट सबसे ज्यादा है। उसी दर पर सभी गांवों को मुआवजा मिलना चाहिए। किसानों ने मुआवजे के अतिरिक्त अन्य स्थान पर भूमि भी मांगी है, ताकि वे खेती करके जीवन-यापन करें। खार भूमि और बहला भूमि का भू-अर्जन एक ही दर पर न करने के लिए कई बार आवेदन किया जा चुका है, लेकिन इस पर कोई कार्यवाही नहीं होने से वे आंदोलन के लिए बाध्य हो गए हैं।
362 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित
खदान की जनसुनवाई को लेकर प्रशासन पहले ही अलर्ट मोड पर है। एसईसीएल की पेलमा माइंस का अब खुलकर विरोध होने लगा है। एसईसीएल ने वन भूमि पर अनुमति लेने के लिए आवेदन किया है। वन भूमि 293 हे. और राजस्व वन भूमि 69 हे. प्रभावित हो रही है। खदान से 15 मिलियन टन कोयला प्रतिवर्ष उत्पादन होगा। महाजेंको, सीएसपीजीसीएल की तरह ही इस माइंस का एमडीओ भी अडाणी इंटरप्राइजेस को मिला है। पूर्व में किसानों ने आठ गांवों में 60 लाख रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से या अधिकतम सर्किल रेट के हिसाब से मुआवजा, प्रति एकड़ एक नौकरी, नौकरी के एवज में मुआवजा 10 लाख रुपए, विस्थापन लाभ प्रति परिवार कम से कम 10 लाख रुपए, दस्तावेज जमा करने के छह महीने के अंदर नौकरी देने की मांग की थी।
