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PM मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘सैन्य धाम’ की लागत हुए दोगुनी, 55 करोड़ था बजट, 92 करोड़ हुए खर्च, 12 करोड़ और मांगे

Nkc News Desk June 23, 2026

देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में बड़े दावों के साथ शुरू किया गया सैन्य धाम प्रोजेक्ट अब भारी भरकम बजट खर्च के लिए चर्चाओं में है. हालात ये है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी फिर करोड़ों का बजट मांगा जा रहा है. अब तक सैन्य धाम पर निर्माण एजेंसी बजट खर्च में 100 करोड़ के करीब पहुंच गई है, इसके बावजूद सैन्यधाम के पूरी तरह से तैयार होने की जल्द कोई उम्मीद नहीं है.

अनुमानित लागत 55 करोड़ रुपए थी: उत्तराखंड सरकार का महत्वाकांक्षी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में शामिल सैन्यधाम एक बार फिर चर्चा में है. वजह है लगातार बढ़ता बजट, निर्माण में हो रही देरी और परियोजना के पूरा होने को लेकर बने सवाल. जिस सैन्यधाम को कभी लगभग 55 करोड़ रुपये की लागत से तैयार करने का अनुमान लगाया गया था, उस पर अब तक करीब 92 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. इसके बावजूद निर्माण एजेंसी ने अतिरिक्त 12 करोड़ रुपये की मांग कर दी है. यदि यह राशि भी स्वीकृत हो जाती है तो सैन्यधाम की लागत 104 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच जाएगी.

104 करोड़ रुपए तक पहुंची बजट: सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 104 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी सैन्यधाम पूरी तरह तैयार हो जाएगा? जवाब है नहीं. क्योंकि इसके भीतर प्रस्तावित संग्रहालय, प्रदर्शनी भवनों और अन्य व्यवस्थाओं के लिए अलग से बजट की आवश्यकता होगी. ऐसे में यह परियोजना अब अपने बढ़ते खर्च और लंबी समय सीमा को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है.

बड़े सपनों के साथ हुई थी शुरुआत: सैन्यधाम का विचार उत्तराखंड के उन शहीद सैनिकों की स्मृति को सम्मान देने के लिए सामने आया था, जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया. साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैन्यधाम को उत्तराखंड का पांचवां धाम बताते हुए इसकी घोषणा की थी. इसके बाद 15 दिसंबर 2021 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देहरादून के गुनियाल गांव में इसका शिलान्यास किया.

करीब चार हेक्टेयर क्षेत्र में बन रहे इस सैन्य धाम के लिए उत्तराखंड के 1734 शहीद सैनिकों के घरों से मिट्टी एकत्र की गई थी. इसे सैनिक सम्मान और राज्य की सैन्य परंपरा का प्रतीक बताया गया, लेकिन जिस परियोजना को राष्ट्रीय महत्व का प्रतीक बनना था, वह शुरू से ही विवादों में घिरती चली गई.

55 करोड़ से 104 करोड़ तक पहुंचा खर्च: किसी भी सरकारी परियोजना की शुरुआत से पहले उसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जाती है. इसी आधार पर लागत का अनुमान लगाया जाता है और बजट स्वीकृत किया जाता है. सैन्य धाम के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी. प्रारंभिक आकलन के अनुसार सैन्य धाम को लगभग 55 करोड़ रुपये में तैयार होना था, लेकिन निर्माण शुरू होने के बाद लगातार नए कार्य जोड़े जाते गए. परियोजना में संशोधन हुए, नई आवश्यकताएं सामने आईं और अतिरिक्त बजट की मांग बढ़ती गई.

स्थिति यह है कि अब तक इस परियोजना पर लगभग 92 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. इसके बावजूद निर्माण एजेंसी पेयजल विभाग ने हाल ही में पहले 8 करोड़ और बाद में 4 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग रख दी. यानी कुल 12 करोड़ रुपये और मांगे गए हैं. सरकारी सूत्रों के अनुसार इनमें से 4 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल भी चुकी है, जबकि शेष राशि पर विचार चल रहा है. यदि पूरी मांग स्वीकार कर ली जाती है तो सैन्य धाम की कुल लागत 104 करोड़ रुपये के पार पहुंच जाएगी.

आखिर किस काम के लिए मांगा गया अतिरिक्त बजट?: निर्माण एजेंसी ने अतिरिक्त बजट की आवश्यकता कुछ ऐसे कार्यों के लिए बताई गई है जो मूल डीपीआर में शामिल नहीं थे या बाद में जोड़े गए. इनमें प्रमुख रूप से

भवन में लिफ्ट की स्थापना,
अत्याधुनिक लाइटिंग व्यवस्था,
सौंदर्यीकरण और सजावट,
विभिन्न संरचनाओं का फिनिशिंग कार्य
आगंतुक सुविधाओं का विकास शामिल हैं.
चार करोड़ के बाद भी अधूरा रहेगा सैन्यधाम?: सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अतिरिक्त बजट मिलने के बाद भी सैन्य धाम पूरी तरह तैयार नहीं माना जाएगा. सैन्यधाम के भीतर संग्रहालय, प्रदर्शनी कक्ष, डिजिटल डिस्प्ले, सैन्य इतिहास से जुड़े प्रदर्शन, स्मारक सामग्री और अन्य व्यवस्थाओं के लिए अलग से धनराशि की जरूरत पड़ेगी.

सैनिक कल्याण विभाग को इन भवनों के भीतर आवश्यक सामग्री स्थापित करनी होगी, जिसके लिए अलग बजट का प्रावधान करना पड़ेगा. यानी वर्तमान में मांगी जा रही राशि केवल भवन निर्माण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी है. इसके बाद भी परियोजना पर खर्च का सिलसिला जारी रह सकता है.

भूमि विवादों ने बढ़ाई मुश्किलें: सैन्य धाम का इतिहास केवल बढ़ते बजट तक सीमित नहीं है. इस परियोजना की शुरुआत से ही भूमि विवाद इसके साथ जुड़े रहे हैं. परियोजना के लिए जिस भूमि का चयन किया गया, उसे लेकर कई सवाल उठे. विपक्ष और स्थानीय लोगों ने भूमि चयन प्रक्रिया पर आपत्ति जताई. मामला धीरे-धीरे न्यायालय तक पहुंच गया.

साल 2024 में यह विवाद उत्तराखंड हाईकोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने परियोजना पर रोक लगा दी। बाद में कानूनी प्रक्रिया पूरी होने और विभिन्न पक्षों की सुनवाई के बाद निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने की अनुमति मिली, लेकिन इस पूरे विवाद ने परियोजना की समय सीमा को काफी प्रभावित किया. निर्माण कार्य कई चरणों में प्रभावित हुआ और लागत भी बढ़ती चली गई.

अक्टूबर 2024 में पूरा होने का दावा, 2026 में भी अधूरा: हैरानी की बात यह है कि अक्टूबर 2024 में सैन्य धाम का निर्माण पूरा होने का दावा किया गया था. उस समय कहा गया था कि परियोजना अंतिम चरण में है और जल्द ही जनता के लिए खोल दी जाएगी, लेकिन अब वर्ष 2026 का आधा समय बीत चुका है और परियोजना अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है. साइट पर कई कार्य अभी भी अधूरे हैं. निर्माण एजेंसी और विभागीय अधिकारियों के बीच विभिन्न तकनीकी प्रक्रियाएं भी लंबित हैं. ऐसे में सैन्यधाम के उद्घाटन की कोई निश्चित तारीख फिलहाल सामने नहीं आई है.

हैंडओवर की प्रक्रिया भी अधूरी: परियोजना की स्थिति को समझने के लिए एक और तथ्य महत्वपूर्ण है. निर्माण एजेंसी ने अभी तक सैन्यधाम को सैनिक कल्याण विभाग को औपचारिक रूप से हस्तांतरित नहीं किया है. यानी जिस विभाग के उपयोग के लिए यह परियोजना बनाई जा रही है, उसके पास अभी तक इसका पूर्ण नियंत्रण नहीं पहुंचा है.

सैनिक कल्याण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि हैंडओवर प्रक्रिया जारी है. इसके लिए एक समिति गठित की गई है. समिति निर्माण कार्यों की समीक्षा कर रही है. उसकी रिपोर्ट मिलने के बाद भवन को औपचारिक रूप से विभाग को सौंपा जाएगा. हालांकि इस प्रक्रिया में भी समय लग रहा है, जिससे परियोजना की पूर्णता पर प्रश्नचिह्न बना हुआ है?

कांग्रेस के निशाने पर सरकार: सैन्य धाम परियोजना को लेकर कांग्रेस शुरू से ही सरकार पर हमलावर रही है. कभी वन भूमि विवाद तो कभी निजी संपत्ति हस्तांतरण के मुद्दे पर कांग्रेस ने लगातार सवाल उठाए. उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस परियोजना के बहाने सरकार पर बजट के दुरुपयोग का आरोप लगाया है.

सैनिकों के नाम पर राजनीति की जा रही है और करोड़ों रुपये की बंदरबांट हो रही है. यदि परियोजना की सही योजना बनाई गई होती तो लागत लगभग दोगुनी नहीं होती. आखिर बार-बार बजट बढ़ाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

-गणेश गोदियाल, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस-

बीजेपी ने दिया जवाब: दूसरी ओर भाजपा इस परियोजना को सैनिक सम्मान का प्रतीक बताते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रही है.

इतनी बड़ी और भावनात्मक महत्व वाली परियोजनाओं में कभी-कभी तकनीकी कारणों से समय बढ़ सकता है. जब तक परियोजना पूरी नहीं हो जाती तब तक सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन सरकार इसे जल्द पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है. सैन्यधाम तैयार होने के बाद यह उत्तराखंड की पहचान बनेगा और देशभर के लोग यहां आकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देंगे
-कुंवर जपेंद्र सिंह, प्रदेश प्रवक्ता भाजपा-

सैन्य धाम को लेकर सवाल: सैन्य धाम को लेकर अब सबसे बड़ा प्रश्न जवाबदेही का है. यदि प्रारंभिक लागत 55 करोड़ रुपये थी तो वह लगभग दोगुनी कैसे हो गई? यदि अतिरिक्त कार्य जरूरी थे तो क्या उनकी योजना पहले नहीं बनाई जा सकती थी? यदि अक्टूबर 2024 में परियोजना पूर्ण होने का दावा किया गया था तो 2026 तक भी यह अधूरी क्यों है? और यदि अभी भी संग्रहालय तथा अन्य व्यवस्थाओं के लिए अलग बजट चाहिए तो आखिर अंतिम लागत कितनी होगी?ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सरकार, निर्माण एजेंसी और संबंधित विभागों को देना होगा.

पढ़ें—

Tags: 'सैन्य धाम' 55 करोड़ था बजट 92 करोड़ हुए खर्च PM मोदी ड्रीम प्रोजेक्ट लागत हुए दोगुनी

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