२ जून २०२३ रेल हादसा
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त्वरित टिप्पणी- शशांक खरे
इंट्रो- कुछ दिनों के बाद लोगों का दर्द, आंसू …सरकारी मरहम पट्टी में दब जाते हैं. ये वक़्त आलोचना का नहीं है, ये वक़्त आंसू पोंछने का है. लेकिन, ये भी सच है कि इन मासूमों के आंसू ही बता रहे हैं, कि सरकारी तंत्र ने ही आंसू बहाने विवश किया है. स्पॉट पर केवल चीख-पुकार, रोने की आवा•ा, अपनों को ढूंढ़ती निगाहें, अफरा-त$फरी, लाशों के ढेर… $खून की नदी…एक ऐसा मं•ार, जिसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है. ट्रेनों के संचालन में लापरवाही कोई नहीं बात नहीं. एसी रूम से बाहर अधिकारी निकलते ही नहीं. ऐसे में बड़े-बड़े हादसे नहीं होंगे, तो क्या होंगे? इतिहास गवाह है, रेलमंत्री पहले नैतिकता के नाते सारी •िाम्मेदारी लेते थे और इस्ती$फा सौंप दिया करते थे. लेकिन, वो दिन अब गए, कुर्सी से चिपके रहना ही इनका सियासी शगल है. यही उनका राजधर्म और देश के प्रति जवाबदेही है.

विवरण
ओडिशा के बालासोर •िाले में २ जून २०२३ की शाम साढ़े सात बजे रेल हादसे में ३०० से अधिक मौतें और $करीब १००० से भी अधिक घायलों की चीख सरकारी तंत्र की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है. ऐसे समय में रेल हादसे ज्यादा हो रहे हैं. जब सरकार जगह-जगह से हाईटेक और लग्जरियस वंदे भारत ट्रेन का शुभारंभ करती जा रही है. एक तर$फ तरक़्की की रफ़्तार तो दूसरी ओर हादसों का मं•ार. देश की जनता कोरोना काल के बाद ट्रेन सेवा से वैसे भी आ•ाी•ा आ चुकी है. ट्रेनों का कैंसिलेशन और टिकट दर में वृद्धि ने पैसेंजर की कमर तोड़ कर रख दी है. ऐसे समय में रेल हादसे!…यह तो बेहद पीड़दायक है.
कोरोमंडल एक्सप्रेस और एसएमवीटी हावड़ा सुपर फास्ट एक्सप्रेस के 17 डिब्बे पटरी से उतर गए. ओडि़शा के बहानागा में हुआ ये हादसा विगत १५ सालों के भीतर देश में हुए सबसे भीषण रेल हादसों में सबसे भीषण रेल हादसा है. हावड़ा से चेन्नई जा रही कोरोमंडल एक्सप्रेस मालगाड़ी से टकराकर पटरी से उतर गई. इससे कई डिब्बे बेपटरी होकर दूसरे ट्रैक पर जा गिरे. इसी बीच उसी ट्रैक पर आ रही यशवंतपुर हावड़ा दूरंतो एक्सप्रेस ट्रेन उतरी हुई बोगियों से टकरा गई. सरकार ने एनडीआरएफ, ओडीआरएएफ और लोकल स्तर पर अपनी टीम को घायलों की सेवा में लगा दिया है. समाजसेवी संगठन अपनी भूमिका निभा रहे हैं. वहीं, मृतकों के परिजनों को मुआव•ो के तौर पर दस लाख, गंभीर लोगों दो लाख, मामूली घायल को ५० ह•ाार रुपए और पीएम राहत कोष से भी मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख, घायलों को ५०-५० ह•ाार रुपए आर्थिक सहयोग कर मरहम पट्टी की घोषणा कर दी है. नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने तीन जून को एक दिवसीय राजकीय अवकाश की घोषणा कर दी.
ये वक़्त आलोचना का नहीं है, ये वक़्त आंसू पोंछने का है. लेकिन, ये भी सच है कि इन मासूमों के आंसू ही बता रहे हैं, कि सरकारी तंत्र ने ही आंसू बहाने विवश किया है. स्थानीय स्तर और केंद्र स्तर पर शोक जताया जा चुका है. घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना ईश्वर से की जा रही है. रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव दूसरे दिन शनिवार तीन जून को घटनास्थल पहुंच कर जायजा ले चुके हैं और अधिकारियों को यथासंभव तत्काल सहयोग करने निर्देश जारी कर चुके हैं. उन्होंने सा$फ कहा है कि इस हादसे की उच्च स्तरीय जांच की जाएगी. जांच के बाद ही कुछ कहा जाएगा. लेकिन, इस हादसे से कब सबक लेंगे हम? बस, एक मात्र यही सवाल हल्कों में चर्चा का विषय है. जो टिस पैदा करता है. किसी मांग उजड़ी, किसकी गोद सूनी हुई, कौन यतीम हो गया…ये ऐसे अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिसकी भरपाई सरकार के चंद रुपयों से संभव नहीं है.
क्यों होते हैं हादसे?
क्यों होते हैं रेल हादसे? इसका जवाब मंत्रालय के पास भी नहीं है? क्योंकि, जब भी ऐसा हादसा होता है, सिचुएशन के हिसाब से मुआवजा देकर घडिय़ाली आंसू बहा दिया जाता है. कुछ दिनों के बाद मामला जस के तस हो जाता है. कुछ दिनों के बाद लोगों का दर्द, आंसू …सरकारी मरहम पट्टी में दब जाते हैं. मीडिया में आई प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया गया है कि सिग्नल सिस्टम खराब था, इसलिए एक पटरी पर दो गाडिय़ां टकरा गई. इस टक्कर में कुछ डिब्बे मालगाड़ी के ऊपर ताश के पत्तों की तरह एक बाद एक गिरने लगे. हादसा इतना भयानक था, कि किसी को भी संभलने का मौ$का ही नहीं मिला. स्पॉट पर केवल चीख-पुकार, रोने, अपनों को ढूंढ़ती निगाहें, अफरा-त$फरी, लाशों के ढेर… $खून की नदी…एक ऐसा मं•ार जिसे, शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है.
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फिर भी नहीं चेते
साल २०११ के बाद हुए बड़े रेल हादसों पर न•ार डालें तो २२ जनवरी २०१७ हीराखंड एक्सप्रेस- ३९ मौतें, १९ अगस्त २०१७ उत्कल एक्सप्रेस- २१ मौतें, ९७ घायल, २० नवंबर २०१६ पुखरांया हादसा-१५० मौतें, २० मार्च २०१५ जनता एक्सप्रेस- ३४ मौतें, ४ मई २०१४ सावंतवादी पैसेंजर- २० मौतें, १०० घायल, २८ दिसंबर २०१३ नांदेड़ एक्सप्रेस – २६ मौतें, ३० जुलाई २०१२ तमिलनाडू एक्सप्रेस-३० मौतें, ७ जुलाई २०११ यूपी दुर्घटना-३८ मौतें, २०१२ में सबसे ज्यादा १४ रेल हादसे हुए थे. इतने बड़े-बड़े हादसों से भी मंत्रालय ने सबक नहीं लिया. रेल मंत्रालय इस हादसे की जांच करवाएगा. क्यों हादसा हुआ? किसकी लापरवाही से हुई दुर्घटना? इन तमाम सवालों पर गंभीरता से पड़ताल की जाएगी. इसका मतलब ये नहीं है कि भविष्य में कभी हादसे नहीं होंगे. हादसे होंगे, क्योंकि हादसों को रोकने न तो हम गंभीर हैं, न ही हमने कोई सिस्टम बनाया है. मोटी तनख्वाह पाने वाले अ$फसर कभी एसी रूम से बाहर निकलकर •ामीनी ह$की$कत से वाकि$फ भी हों, तभी कुछ हद तक रेलवे में प्रशासनिक कसावट आएगी, अन्यथा मौतों का सिलसिला चलता रहेगा.
