कथा ,कहानियों के पात्र मानव मन पर विशेष प्रभाव डालते हैं ।
बालमन कोवह सीख देते हैं ,बालकों का मार्गदर्शन भी करते हैं । एक समय था जब भारत की शिक्षण पद्धति में कहानियां शीर्ष पर थीं।पाठ्यक्रम के साथ बाल साहित्य भी खूब पढा़ जाता था ।लेकिन आज कक्षा दो तीन का बच्चा छोटे वाक्यों को मिलाकर पढ़ने में सक्षम नहीं है कहीं तो भाषाई दिक्कतें हैं।कहीं अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी की कहानियों को गैरजरूरी करार दे दिया गया है ।अन्य भाषा का थोपा जाना वास्तव मे बालमन के लिए चुनौतियों से भरा है ।क्योंकि अपनी भाषा में भावनाऐं हर कोई स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकता है ।अपने भावों के साथ वह संदेशों को विस्तार भी दे सकता है।लेकिन दूसरी भाषा को बालक केवल रटता है । उसका मतलब भी नहीं समझ पाता है ।
बीते समय में एक राजा के पुत्रोंको उनके शिक्षक ने नैतिक शिक्षा और संस्कार सिखाने के लिए पंचतंत्र की कहानियों की रचना की थी वह कहानियां आज भी बच्चों के मन मेंप्रश्न पैदा करती हैं और जिज्ञासा जगाती हैं।बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाऊंडेशन केएक सर्वे के अनुसार बताया गया है कि कहानियां बच्चों की शिक्षण सम्बन्धी उलझनों को भी सरल बनाती हैं । लेकिन आज बच्चों के ऊपर केवल अपने कक्षा के पाठ्यक्रम को याद करो , कहानियों को पढ़कर समय बरबाद मत करो ,ऐसा कहते बालकों के अभिभावक भी पाए जाते हैं ।
कथाओं की वाचिक परम्परा ज्ञान का विस्तार तो करती ही है साथ ही बाल मन को कल्पना की उड़ान भी देती है वह सदाचार की शिक्षा देती है तो पात्रों के माध्यम से चरित्र गढ़ने का भी कार्य करती है आजकल तो नैतिक मूल्यों को सिखाने के लिए पाठ्यक्रम मे एक पुस्तक अलग से रखी गई है। जिसमें समाज में रहने के ज्ञान को कहानियों के माध्यम से पढा़या जाता है ,जिसमें नम्बर भी मिलते हैं । लेकिन अफसोस उसको पढा़ना बच्चे में समाजिक ज्ञान का बोध नहीं जगाताहै वह ज्ञान सिर्फ नम्बर पाने तक ही सीमित है ।
बाल कहानियों में राज्य का राजा एक गरीब बुढ़िया के द्वारा दिए गए एक रुपए के सिक्के से भण्डारे के भोजन में नमक डलवाकर उस एक रुपये का दान भी सार्थक करता है। तो वहीं पत्थर का शोरबा नामक बाल कहानी में मार्ग में भटका
सिपाही अपनी समझदारी से एक बदमिजाज बुढिया से खाना बनाने के सारे मसाले और दाल लेकर अपने लिए खाने का व्यंजन बना ही लेता है । इस तरह वहअपनी क्षुधा को शांत करता है, और बाल मन में कौतुहल भी जगाता है कि पत्थर से शोरबा कैसे बना ?
एक अन्य कहानी में जब रुपा चाकलेट से सने हाथोंसे गुड़िया से खेलती है तो गुडिया के कपड़ों पर जगह जगह पर चाकलेट लग जाने से चूहे गुड़िया को जगह जगह से काटकर खराब कर देते हैं। उससे रुपा को यह सीख मिलती है कि हाथों को साफ रखना चाहिए।गन्दगी से नुकसान होता है ।
विवेकानंद जी को हनुमान जी का चरित्र बहुत प्रेरित करता था कक्षा में उनके शिक्षक यह बतातेहैं कि हनुमान जी , पास वाले केले के बागीचे मे केले खाने आते रहते हैं , तो विवेकानंद जी हनुमान जी से मिलने के लिए दिन भर बगीचे में बैठे रहे हनुमान जी से नहीं मिलने के कारण वह उदास होकर घर पहुंचे तो उनकी माता ने बालक को समझाया कि आज हनुमान जी श्रीराम के काम से कहीं गए होंगे ?तुम अन्य किसी दिन मिल लेना
पुराणों की कथाएं चरित्र मे सत्यता गढ़ती हैं ।प्रेरणा देती हैं
तो वही पाठ्यक्रम को रोचकता देती है । कहानी कहने के बहुत तरीके हैं ,जिन्हें लोरी ,कांवड विद्या ,कठपुतली खेल , पांडवानी आदि , पहले हर घर में एक अलमारी अवश्य होती थी जिसमें कहानियों की किताबें और कामिक्स रहती थी , बच्चे गर्मियों की छुट्टीयों में अपने मित्रों को भी वह पढ़ने के लिए देते थे । आज केवल कोर्स का रटना और नम्बर लाना ही प्राथमिक है ।स्कूलों में शिक्षक मात्र कोर्स पूरा करवाते हैं और माता पिता फीस देकर इति श्री कर रहे हैं ।
बाल मन को आज कोई नहींसमझता शिक्षा व्यवस्था में तो किस्सा गोई उपेक्षित हो रही है तो वहीं घर का माहौल और जीवन शैली में भी संस्कार और समृद्धि की कल्पना गौण हो चुकी है ।
क्या बच्चे का भविष्य केवल ज्यादा नम्बर और विदेशी भाषा के डिब्बे में कैद है ?
कहानियां अपने सुसंदेशो से अहं नहीं वयम् का भाव सिखाती है । वसुधैव कुटुम्बकम् और स्वच्छता का संदेश उन्हे कहानियों को समझने से ही मिलता था । वह बच्चों के मन मेंजीवन प्राण तक फूंकती थीं ,आज कहानियों को कमतर आंक कर हम बचपन को अवसाद और भय की स्थितियों तक ले आए है । वह स्थितियां बच्चे को आत्महनन तक ले जा रही हैं। कम नम्बर आने पर आत्महत्या और फेल होने पर आत्म हनन आज काफी हद तक बढ़ गया है ।
यह सही है कि प्रत्येक बाल मन का स्तर अलग अलग होता है और कहानियों का उद्देशय केवल सुसोच और सृजनात्मकता को फैलाना ही होता है । सृजनात्मकता और अच्छी सोच के साथ बच्चों का विकास और बेहतर राष्ट्र का निर्माण सम्भव है ।
कहानियां बाल मन का आहार होती हैं बचपन में पढ़ी कथा हमारे मन के कोने में बडा़ होने पर भी सुंदर सीख की तरह सजी रहती हैं उन्ही के सहारे हमारा मन एक मौलिक लायब्रेरी बना लेता है । जो हमें विकसित होनेपर अनेक शब्दों के कीमती छायाचित्र समय समय पर स्वयं ही उपलब्ध कराता रहता है । जो जीवन मेंं सम्बल देने का कार्य भी करती हैं ।
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के भारत अध्ययन केंद्र पर कार्य शाला में मध्य एशिया में पंचतंत्र के प्रसार पर वक्ताओं ने विस्तृत चर्चा भी की थी उनके अनुसार भारत की ग्लोबल ब्रांडिंग का हिस्सा पंचतंत्र रहा है । भारत से मध्य एशियाई सम्बंध के मूल में भी पंचतंत्र ही है । जिसने भारत का परिचय पूरे विश्व से करवाया विश्व की पचास भाषाओं में पंचतंत्र के लगभग दो सौ संस्करण उपलब्ध हैं ।
सर्वप्रथम “पहेलवी” भाषा में तथा अरबी भाषा में “कलीलवुध्यिम्न” के रुप में पंचतंत्र मध्यकालीन एशिया में गया
साथही विद्वान बताते हैं कि पंचतंत्र जैसा ग्रंथ भारतीय शैक्षिक माहौल को सुधारने में संजीवनी का कार्य करेगा
यह सही है कि हर सभ्यता के पास अपनी कथाओं अपनी नैतिक शिक्षाओं का बहुमूल्य भण्डार होता है । जिसने हमारे भविष्य को सहेजा है सवांरा भी है । जिससे जुडे अनेक नाम हमें हमें आज भी प्रेरणात्मक ओज से ओत प्रोत रखते हैं । वह प्रेरणादायक कहानी उन्हें दादा दादी नानी नाना सुनाते थे । संयुक्त परिवार में बच्चे यही गुणों का खजाना संस्कार के रुप में पाते थे । लेकिन आज संयुक्त परिवार नहीं हैं । अभिभावक भी समय ही ऐसा है कहकर अपना दायित्व छोड़ रहे हैं । अभिभावक का यह व्यवहार भी गलत है । और बच्चे के भविष्य के प्रति खिलवाड़ है ।बचपन वही दोहराता है जो वह देखता है हर अभिभावक को शिक्षक को समाज को बच्चों के मार्गदर्शन का बीडा़ उठाना होगा जिससे बाल मन अपने दायित्व बोध ,अनुशासन ,कला संस्कृति संस्कार की सुगठित कड़ियों से स्वयं ही अनुशासित हो जीवन को लाभप्रद बनाता जाए
आज के माता पिता बच्चों को पाठ्यपुस्तकों के साथ अच्छा साहित्य उपलब्ध कराएं माता पिता को को भी अपने जीवन का संदेश अच्छा ही देना चाहिए। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि बच्चा केवल कोर्स पढे क्योंकि जब वह कहानियां पढ़ रहा होता है तो वह अपनी कल्पना की ऊंची उड़ान के साथ नैतिक बोध और सु संदेशों की पाठशाला का विद्यार्थी बन सद्ज्ञान को आत्म सात कर रहा होता है ।
डिजीटल क्रांति ने आज कहानियों के अनेक रुप हमें हमें दिए हैं जिनमें कहानी का मौलिक स्वरूप बना रहे हमें यह देखना है । बोलती किताबें और ई बुक आज बहुत सारा ज्ञान और साहित्य हमें दे रही हैं । कहानियों के साथ उपेक्षित नहीं पूर्णता का मिलना भविष्य को सुंदर बनाने में मूल्यपरक योगदान देगा
किस्सागोई के महत्व को बनाए रखना हमारा करणीय धर्म होना चाहिए।

