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  • स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गढ़ माना जाता है पाटन
  • छत्तीसगढ़

स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गढ़ माना जाता है पाटन

NKC News August 14, 2023

छत्तीसगढ़ में आजादी के दीवानों की बात की जाए तो सबसे ज्यादा स्वतंत्र संग्राम सेनानी दुर्ग के पाटन से ही थे यहां 75 से ज्यादा सतना शाम सेनानी हुए ग्राम देवादा से 12 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आजादी के आंदोलन में शामिल थे। इन सेनानियों के नाम पाटन मर्रा, सेलूद, रानीतराई, जामगांव, दुर्ग के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूलों में आजादी की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर 1975 में स्थापित शिलालेखों में अंकित की गई है। अंग्रेजो को नही मिली बैलगाड़ी सेनानी परिवार से संबद्ध व उनके संस्मरणों को संकलित करने वाले पाटन के हेमंत कश्यप बताते हैं कि अंग्रेजों की मार से बेहोश हुए घसिया मंडल को रायपुर ले जाने अंग्रेजों को बैलगाड़ी तक नहीं मिली। इसलिए बात की चैली बनाकर गंभीर रूप से घायल घसिया मंडल को रायपुर जेल पहुंचाया गया। उनके ऊपर कोई मुकदमा भी नहीं चला और कैदी के रूप में उन्हें 14 अक्टूबर 1942 को जेल में डाल दिया।

Freedom Fighter: अंग्रेजों की मार से घायल होकर भी सीने में दबाए रखा तिरंगा, शहीद हो गए दुर्ग के घसिया मंडल | Freedom Fighter: The tricolor was kept pressed in the chest even after being injured by the British, Ghasiya Mandal of the Durg was martyred - Hindi Oneindia
ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ में आजादी के दीवानों में सबसे ज्यादा स्वतंत्र संग्राम सेनानी दुर्ग के पाटन से ही थे. यहां 57 से ज्यादा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए. ग्राम देवादा से 14 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आजादी के आंदोलन में शामिल थे. इन सेनानियों के नाम पाटन मर्रा, सेलूद, रानीतराई, जामगांव, दुर्ग के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूलों में 1975 में स्थापित शिलालेखों में अंकित किए गए हैं. इन में से 6 एक ही परिवार के सदस्य हैं. यहां मालगुजार से लेकर गांव के कोटवार तक सभी ने अपना-अपना योगदान आजादी के आंदोलन में दिया था.

सैकड़ों मील पैदल चलकर जगाई आजादी की अलख
महात्मा गांधी का नमक सत्याग्रह आंदोलन, अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन, स्वदेशी आंदालेन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान भुलाया नहीं जा सकता. पाटन और दुर्ग ब्लॉक के गांवों में आजादी का अलख जगाने के लिए अंग्रेजों से लुक-छिप कर वही सेनानी अपनी रणनीति सेलूद बंगला में ही बनाते थे. लोग जब डर के साए में घर से निकल नहीं पाते उस कठिन दौर में हमारे सेनानियों का यह नारा ब्रिटिश युद्ध प्रयत्न में जन धन देना मूल है, सकल युद्ध अवरोध में सत्य-अहिंसा मूल है, गांव गांव में चलाया और जनमानस को जोड़ा. सैकड़ों मील पैदल चलकर लोगों में देश की आजादी की अलख जगाई.

15 दिन जेल में रखकर हिदायत देकर छोड़ते थे
क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों को अक्सर पैदल मार्च करते और आंदोलन की रणनीति बनाते समय अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार किया. सेनानियों को सेंट्रल जेल रायपुर में ले जाकर बंदीगृह में डाल दिया जाता. यहां के सेनानी अधिकतम 15 दिनों तक जेल में बंद रहे हैं और उसके बाद इस हिदायत के साथ छोड़ दिए जाते थे.

अंग्रेजों की मार से घायल होकर भी सीने में दबाए रखा तिरंगा, शहीद हो गए दुर्ग के घसिया मंडल

 जिन पर अंग्रेजों का कहर ऐसा बरपा की आजादी के लिए आयोजित सभा में तिरंगा लहराकर लोगों में जोश भरने वाले सेनानी घसिया मंडल को बंदूक की बट से मार-मारकर अंग्रेजो ने घायल कर दिया। लेकिन तिरंगा उनके हाथ नही लगने दिया। सुराजी सभा का किया गया था आयोजन, पहुंचे अंग्रेज बात उस वक्त की है जब देश की आजादी के लिए आंदोलन चरम पर था। 14 अक्टूबर1942 को पाटन क्षेत्र ले ग्राम अमलीडीह का साप्ताहिक बाजार होता था। यहां गांधीजी के अनुयायियों ने सुराजी सभा रखी गई थी। सेनानी घसिया मंडल भी सभा में शामिल थे। तिरंगा लेकर वे मंच के बगल में खड़े हो गए। इस सभा की सूचना अंग्रेजो तक पहुंची और अंहरेज अफसर वहां पहुंच गए, और सभा का विरोध करने लगे। वह किताब जिसका आधा हिस्सा पाकिस्तान ले गया, तो बाकी हिस्सा भारत के पास रहा

कुंदे की मार से सर फट गया पर अंग्रेजों को तिरंगा छीनने नहीं दिया

मण्डल ने सीने में दबाए रखा तिरंगा अंग्रेजों ने सभी से बलपूर्वक तिरंगा छीनने का प्रयास किया, बहुत से लोगों से तिरंगा छीन लिया गया। लेकिन वे घसिया मण्डल के हाथों से तिरंगा नही छीन सके। अंग्रेज अफसर ग्रामीणों से गाली गलौज मारपीट करने लगे जिससे गुस्साए घसिया मंडल ने अपनी तुतारी (नुकीली) लाठी से अंग्रेज अफसर के चेहरे पर ऐसा प्रहार किया कि खून बहने लगा। अंग्रेज पुलिस अफसर घसिया मंडल पर टूट पड़े और बंदूक के कुंदे से मारने लगी। अंग्रेजो की मार से घसिया मण्डल का सिर फट गया। उस दौर में तिरंगे के प्रति सम्मान को इस बात से समझा जा सकता है की घायल होने के बाद भी घसिया मण्डल ने तिरंगा अपने सीने में दबाए “भारत माता की जय” के नारे लगाते रहे। लेकिन झंडा अंग्रेजों को नहीं दिया।

घसिया मण्डल ने जेल में त्याग दिए प्राण घसिया मण्डल ने जेल में त्याग दिए प्राणघायल अवस्था व अंग्रेजों के कठोर यातनाओं के बीच वे जेल में 135 दिन तक रहे। इस दौरान भी वे जेल में बंदियों में राष्ट्रप्रेम जगाने का काम करते रहे। अंतत: 27 फरवरी 1943 को जेल में ही उसकी मृत्यु हो गई। भारी सुरक्षा के बीच पैतृक ग्राम बटंग में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी याद में उनके निवास के पास स्मारक भी बनाया गया है।

Independence Day Special : छत्तीसगढ़ के इस गांव से निकले सबसे ज्यादा स्वतंत्रता सेनानी,आंदोलन के किस्से और सेनानियों की भागीदारी का इतिहास समेटे हुए ...

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