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सर्दियों के मौसम में और दिवाली के अवसर पर जिमीकंद की डिमांड बहुत बढ़ जाती है. आमतौर पर जिमीकंद की सब्जी बनाए जाने की परंपरा रही है, लेकिन अब बनारस जैसे शहरों में मिठाई की दुकानों पर जिमीकंद के लड्डू भी मिलने लगे हैं. जिमीकंद कई नामों से जाना जाता है- कहीं ओल, कहीं सूरन तो ऑनलाइन ये Elephant Foot Yam के नाम से भी मिलता है.आज आपको बताते हैं गमले में जिमीकंद उगाने की पूरी कहानी.
बचपन में तो मैंने देखा था कि बगैर बोये भी ये हर साल उग आता था लेकिन गमले में लगाने के लिए कई बार प्रयास करने पड़े. हालांकि, एक बार मेरे गमले में जगह बना लेने के बाद इसने कभी निराश नहीं किया और परंपरा निभाते हुए हर साल ये अपने आप उग आता है. जिमीकंद से बचपन की मेरी बहुत सारी यादें जुड़ी हुई हैं. गांव में हमारे घर के पीछे खाली जमीन थी, जिस पर हम लोग खेती-खेती खेला करते थे.
लकड़ी में खुरपी बांधकर हल बना लेते और कभी अकेले तो कभी दोस्तों के साथ अपना खेत भी जोत डालते. कभी कोई किसान बन जाता और कभी कोई बैल भी बन जाता. हमारी खेती तो एक छोटे से हिस्से में ही होती, लेकिन उस जमीन का बड़ा हिस्सा जंगल बना रहता. चारों ओर से बाउंड्री होने के चलते कोई जानवर भी नहीं आ सकता था जो चारा न मिले तो तोड़ फोड़ ही मचा दे. नीम, बबूल, अमरूद और शरीफा जैसे फलों के पेड़ भी लगे थे, लेकिन वे ऊपर ही दिखाई पड़ते थे. जिमीकंद के पत्तों ने पूरी जमीन ही ढक डाली थी.
