पिता सलवा जुडूम से जुड़े थे, नक्सलियों की खिलाफत करते थे। पूरा परिवार नक्सल हिंसा के खिलाफ था और इसी का खामियाजा परिवार को समय-समय पर भुगतना पड़ा। पहले नक्सलियों ने पिता को मार डाला फिर बड़े भाई पर जानलेवा हमला किया। भाई पिछले एक साल से कोमा में हैं। यह कहानी बस्तर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे निर्दलीय प्रत्याशी प्रकाश कुमार गोटा की है।
प्रकाश एमबीबीएस डॉक्टर हैं। उन्होंने अपनी पढ़ाई किर्गिस्तान से की है। प्रकाश जब पढ़ाई पूरी कर वापस लौटे तो उनका परिवार नक्सल हिंसा की वजह से पूरी तरह से बिखर चुका था। इसके बाद उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ने की ठानी और अब मैदान में हैं। प्रकाश बीजापुर जिले से आते हैं। प्रकाश युवा हैं और अपने चुनाव प्रचार में वे सिर्फ बदलाव की बात करते हैं। वे कहते हैं कि नक्सल हिंसा को खत्म करने के लिए सरकार को नक्सलियों से बात करनी होगी। ऐसा जब तक नहीं होगा खून बहता रहेगा। प्रकाश कहते हैं कि नक्सल समस्या के चलते बस्तर का विकास थम गया है. बस्तर का विकास तभी होगा जब नक्सलियों से बात होगी।
प्रकाश कहते हैं कि बस्तर में गोलबारी आज आम दिन की घटना है। मैं स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में उतरा हूं। हम यहां जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मेरे पिता और मेरे दादा को नक्सलियों ने मार डाला। भाई भी नक्सलियों की वजह से जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे हैं। मैं परिस्थितियों का शिकार होकर चुनाव मैदान में उतरा हूं और बदलाव लाना चाहता हूं। बस्तर सीट से 11 प्रत्याशी मैदान में हैं इनमें डॉक्टर प्रकाश कुमार गोटा भी हैं। कांग्रेस और बीजेपी के बीच यहां मुख्य मुकाबला है लेकिन प्रकाश के मैदान में उतरने से इतना साफ है कि अब बस्तर के विकास और हिंसा के खात्मे के लिए लोग आवाज उठाने लगे हैं।
प्रकाश बताते हैं कि उनके पिता चिन्नाराम सलवा जुडूम के नेता था और उनकी हत्या 2012 में हुई। इसके बाद बड़े भाई महेश कुमार गोटा नक्सल हमले के बाद से 2023 से कोमा में हैं। प्रकाश कहते हैं कि उनकी लड़ाई सिस्टम से भी है क्योंकि उनके परिवार को इतना कुछ खोने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ। उनके परिवार की सरकार ने मदद नहीं की। सुरक्षा प्रदान करने की मांग भी हमेशा अनसुनी की जाती रही। यही कारण है कि समय-समय पर उनके परिवार के लोगों की मौत होती रही।
Election 2024: खतरा ऐसा कि अपने गांव तक नहीं जा पाते
प्रकाश बताते हैं कि उनके परिवार पर नक्सल खतरे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अपने गांव भी नहीं जा सकते। बीजापुर जिले का फरसेगढ़ उनका गृहग्राम है। नक्सली कई बार उनके घर के बाहर पर्चे फेंककर गांव नहीं आने की चेतावनी दे चुके हैं।

