नई दिल्ली। भूजल के अंधाधुंध दोहन से प्रभावित चिन्हित देश के सात राज्यों के 229 ब्लॉकों की हालत नाजुक दौर में है। इन्हीं ब्लॉकों के आठ हजार से अधिक गांवों और बस्तियों में पीने तक के पानी की किल्लत है, जो संकट के दौर में हैं। अटल भूजल योजना की राष्ट्रीय संचालन समिति की समीक्षा बैठक में ऐसे चिंताजनक हालात के बावजूद राज्यों में योजना की अपेक्षित प्रगति संतोषजनक नहीं पाई गई। खासतौर पर जल संरक्षण की विभिन्न योजनाओं को इसमें समाहित करने में ज्यादातर राज्य रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर वर्ष 2020 में शुरु की गई अटल भूजल योजना वर्ष 2025 तक चलेगी, जिस पर कुल 6000 करोड़ रुपए की लागत का अनुमान है। इसमें सात राज्यों के 80 जिलों के कुल 229 ब्लॉक को चिन्हित किया गया है, जिनके 8220 गांवों में पीने के पानी का तक का गंभीर संकट पैदा हो गया है। ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने इस अटल भूजल योजना लागू की गई है, जिसमें बारिश के पानी को संरक्षित करने के साथ पानी के सदुपयोग को प्रोत्साहित करना शाम
जिन सात राज्यों को इसमें शामिल किया गया है, उनमें गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के गांव शामिल हैं। इसके लिए चालू वित्त वर्ष 2022-23 के लिए लगभग 3000 करोड़ रुपए का प्रविधान किया गया है।
योजना में मानसून सीजन के दौरान इन क्षेत्रों में पानी को संरक्षित करने पर ज्यादा जोर देना है। इसके लिए संबंधित राज्यों, जिलों, ब्लॉकों और गांवों के स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करने और जागरुक बनाना है। जल संरक्षण के साथ जल की जरूरत का भी आकलन करना है।
इसमें सर्वोच्च प्राथमिकता पेयजल की आपूर्ति को है। अटल भूजल योजना को कारगर तरीके से लागू करने के लिए ग्रामीण विकास, कृषि और सिंचाई समेत अन्य योजनाओं को भी शामिल करना है। जल संरक्षण की सभी योजनाएं इसमें समाहित की गई हैं। सबसे ज्यादा जोर सामुदायिक सहयोग पर रहेगा।
समीक्षा बैठक में सभी राज्यों की ओर से अपनी प्रगति का ब्यौरा प्रस्तुत किया गया, जिससे स्पष्ट है कि इन राज्यों में अटल भूजल योजना के लिए निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है। प्रशिक्षण जैसे राज्य में भी ज्यादातर राज्य बहुत पीछे हैं। समीक्षा में पाया गया कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को छोड़कर बाकी राज्यों में प्रशिक्षण का प्राथमिक कार्य भी बहुत पीछे है।
