लक्ष्य वेलफेयर फाउंडेशन के द्वारा आपातकाल दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित “शतायु सम्मान समारोह” के अंतर्गत 100 वर्ष से अधिक आयु के 3 वयोवृद्ध नागरिकों का हृदय से सम्मान किया गया। यह आयोजन न केवल उनके दीर्घ जीवन के प्रति श्रद्धा का प्रतीक था, बल्कि उनके जीवन अनुभवों से प्रेरणा लेने का अवसर भी बना।इस गरिमामयी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के भागीरथ प्रयासों के अग्रदूत एवं “छत्तीसगढ़ भागीरथी” उपाधि से विभूषित डॉ. उदय भान सिंह चौहान जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। साथ ही, लक्ष्य वेलफेयर फाउंडेशन के संस्थापक एवं संचालक श्री संजीव यादव जी इन वयोवृद्ध विभूतियों से आत्मीय संवाद कर उनके जीवन के अनुभवों को जाना।
बातचीत के दौरान उन्होंने साझा किया कि स्वतंत्रता पूर्व भारत कैसा था, उस समय की कठिनाइयाँ, जीवनशैली और अब के भारत में क्या-क्या परिवर्तन हुए हैं। उन्होंने आपातकाल कालखंड (1975) की भी चर्चा की और बताया कि उस दौर में देश में कैसी परिस्थिति थी, कैसे जनता ने सहनशीलता और धैर्य के साथ उस समय का सामना किया।
विशेष उल्लेखनीय रहा कि इन वयोवृद्ध नागरिकों की ऊर्जा और स्वास्थ्य आज भी प्रेरणादायक है। उन्होंने बताया कि दीर्घायु और
इन वयोवृद्धों से न केवल संवाद किया गया, बल्कि उनके परिवारजनों और गांववासियों से भी बातचीत की गई। उन्होंने उनके जीवन के कई अनकहे प्रसंग, दैनिक जीवन के तरीके और उनके संघर्षों की प्रेरणात्मक कहानियाँ साझा कीं।

परिजनों ने बताया –
कैसे इन्होंने हमेशा समय का पालन किया।
कैसे हर मौसम, हर परिस्थिति में प्राकृतिक और सादा जीवन को अपनाया।
परिवार में अनुशासन, सेवा और परंपराओं का महत्व कैसे बना रहा।
गांववासियों ने गर्व से कहा –
> ये हमारे गांव के मूल हैं, हमारी परंपरा और संस्कारों की जीती-जागती मिसाल हैं।
स्वस्थ दीर्घायु का रहस्य:
इन शतायु विभूतियों की एक खास बात यह रही कि उन्होंने अपने स्वास्थ्य का श्रेय प्राकृतिक जीवनशैली को दिया।
वे आज भी नीम की दातून से दांत साफ करते हैं,
मिट्टी से बाल धोते हैं,
शुद्ध, सात्विक और समय पर भोजन करते हैं,
और प्रातः जल्दी उठना तथा दिनचर्या का अनुशासन उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
इन्हीं मूल्यों ने उन्हें जीवन में न केवल दीर्घायु, बल्कि मानसिक, शारीरिक और आत्मिक रूप से स्वस्थ बनाए रखा है।
एक जीवन, एक प्रेरणा:
“जो मिट्टी से जुड़ा है, वो उम्र से नहीं झुका है।”
“प्रकृति की गोद में बसी परंपरा ही शतायु जीवन की असली आधारशिला है।”
“संस्कार, संवेदना और सत्कार – यही हमारी असली पहचान है।”
“संघर्षों से तपकर जो निखरे, वही सच्चे रत्न होते हैं।”
