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पराली और गन्ने का अवशेष जलाने से किसानों में बढ़ रही गुर्दे की बीमारी, रिसर्च

NKC News December 1, 2023

Pilibhit News Sugarcane Farmers Get Decomposer To Prevent Stubble Burning | Pilibhit News: पराली जलाने से रोकने के लिए गन्ना किसानों को मिला डीकंपोजर, वायु प्रदूषण में आएगी कमी

शोधकर्ता जेरेड ब्राउन के मुताबिक इससे पहले ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ जिसमें गुर्दों और ऊतकों में हानिकारक पदार्थ का पता लगाया गया हो. अपने इस अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के शोधकर्ताओं ने अल साल्वाडोर में एक अस्पताल के डॉक्टरों के साथ मिलकर काम किया है. अध्ययन में शोधकर्ताओं को दूसरे किडनी रोगियों की तुलना में इस रहस्यमयी बीमारी के शिकार मरीजों के गुर्दों और ऊतकों में भारी मात्रा में सिलिका के कण मिले है.

उत्तर भारत के राज्यों में धान कटाई के सीजन में बड़ी संख्या में किसानों की तरफ से पराली जलाने के मामले सामने आए हैं. इसका असर ये हुआ कि दिल्ली एनसीआर समेत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में भी प्रदूषण के स्तर में इजाफा देखा गया. दिल्ली-एनसीआर में 400 के पार AQI दर्ज किया गया. हालात इतने गंभीर हो गए थे कि पॉल्यूशन को कंट्रोल करने के लिए सरकार को GRAP-3 के नियम भी लागू करने पड़े. अब इन सबसे इतर अब पराली जलाने को लेकर बेहद डराने वाली खबर आ रही है.

इस जहरीले पदार्थ के चलते किसान हो रहे बीमार

कोलोराडो विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों ने अपने नए अध्ययन में खुलासा किया है कि खेतों में गन्ने के बचे हिस्सों और पराली को जलाने से सिलिका नामक जहरीला पदार्थ निकलता है. इससे किसानों में किडनी से जुड़ी एक रहस्यमयी बीमारी फैल रही है. जर्नल एनवायर्नमेंटल पॉल्यूशन के रिसर्च के मुताबिक गन्ने के अवशेषों और धान की पराली को जलाने से पैदा हुई राख में सिलिका के महीन कण होते हैं. यह कण इंसानों को बीमार करते हैं.

रिसर्च के मुताबिक गन्ने के अवशेषों और धान की पराली को जलाने से सिलिका के कण एनवायरमेंट में फैल जाते हैं. अवशेषों को जलाते वक्त किसान वहां मौजूद होते हैं. ऐसे में सिलिका के कणों के संपर्क में सबसे पहले वही आते हैं. इसके बाद ये कण सांस या दूषित पानी के माध्यम से अन्य लोगों के संपर्क में आने के बाद उनके गुर्दों में प्रवेश कर जाते हैं. इससे लोगों में गुर्दे से जुड़ी गंभीर बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है.

गन्ने में सिलिका की मात्रा सबसे अधिक

रिसर्च के मुताबिक गन्ने की कटाई के दौरान महीन कणों (पीएम10) की मात्रा उल्लेखनीय रूप 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज की गई. वहीं इसको जलाने के दौरान कणों का स्तर बढ़कर 1,800 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया था. गन्ने के तने में करीब 80 फीसदी सिलिका होता है. जब इसके बेकार हिस्से को जलाया जाता है तो उससे सिलिका के महीन कण पैदा होते हैं, जिनका आकार करीब 200 नैनोमीटर होता है.

6 से 48 घंटे में ही दिखने लगता है असर

जब वैज्ञानिकों ने इसपर शोध किया तो पाया कि सिलिका युक्त राख के ढाई माइक्रोग्राम प्रति मिलीलीटर के संपर्क में आने के छह से 48 घंटों के भीतर माइटोकॉन्ड्रियल गतिविधियों और कोशिकाओं के कार्यों पर प्रभाव दिखने लगा था. वहीं इसके संपर्क में आने के छह घंटों के भीतर ही कोशिकाओं की ऑक्सीजन खपत दर (ओसीआर) और अम्लता (पीएच) के स्तर में आए बदलावों से कोशिकाओं के मेटाबॉलिस्म और काम करने के तरीकों में बदलाव आ गए थे. इसी तरह धान की पराली में मौजूद सिलिका नाम का ही पदार्थ किसानों को नुकसान पहुंचा रहा था.

यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो का शोध

इस बारे में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के फार्मास्युटिकल विभाग के प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ शोधकर्ता जेरेड ब्राउन के मुताबिक इससे पहले ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ जिसमें गुर्दों और ऊतकों में हानिकारक पदार्थ का पता लगाया गया हो. अपने इस अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के शोधकर्ताओं ने अल साल्वाडोर में एक अस्पताल के डॉक्टरों के साथ मिलकर काम किया है. अध्ययन में शोधकर्ताओं को दूसरे किडनी रोगियों की तुलना में इस रहस्यमयी बीमारी के शिकार मरीजों के गुर्दों और ऊतकों में भारी मात्रा में सिलिका के कण मिले है.

भारत की स्थिति वैज्ञानिकों की दावों और मजबूत करती है

वैज्ञानिकों के मुताबिक गन्ने और धान की पराली में की राख में भी बड़ी मात्रा में सिलिका के महीन कण होते हैं. इसके आधार पर उनका दावा है कि इस राख के संपर्क में आने से किसानों को यह बीमारी हो सकती है. भारत, श्रीलंका जैसे खेतिहर देशों में गुर्दे की बीमारी बेहद आम हो चली है. यहां पराली और गन्ने के अवशेष की घटनाएं भी लगातार दर्ज की जाती रही है. ऐसे में वैज्ञानिकों के दावों को और पृष्टि मिल रही है.

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