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हनुमान जयंती : पूजा विधि और जरूरी नियम

NKC News April 5, 2023

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को संकटमोचन राम भक्त हनुमान का जन्म हुआ था. इस बार हनुमान जयंती 6 अप्रैल को मनाई जा रही है. राम भक्त हनुमान की इस दिन विशेष पूजा अर्चना करने का विधान है. जानें हनुमान जी की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, पूजा के विशेष नियम. मंत्र के साथ यह भी जान लें कि हनुमान जी की पूजा करते समय किन बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है. जानें क्या करें और क्या नहीं.
6 अप्रैल को हनुमान जयंती के दिन सुबह 06:06 से 07:40 के बीच में पूजा कर सकते हैं. उसके बाद आप दोपहर 12:24 से 01:58 के बीच भी पूजा कर सकते हैं. जो लोग शाम को पूजा करना चाहते हैं वे शाम को 05.07 से 08.07 के बीच कर सकते हैं.
हनुमान जयंती के दिन अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 59 मिनट से दोपहर 12 बजकर 49 मिनट तक है.
हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए चौमुखी दीपक जलाएं. इसके अलावा हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करें.
हनुमान जी की पूजा में गेंदे, हजारा, कनेर, गुलाब के फूल चढ़ाएं जबकि जूही, चमेली, चम्पा, बेला इत्यादि फूलों को चढ़ाने से परहेज करें.
मालपुआ, लड्डू, चूरमा, केला, अमरूद आदि का भोग लगाएं.
हनुमान जी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं.
दोपहर तक इस दिन कोई भी नमकीन चीज खाने से बचें.
इस दिन हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाने से शीघ्र मनोकामना की पूर्ति होती है.

केसरी नंदन का जन्म कैसे हुआ?
पहली कथा :एक बार अंजना ने शुचिस्नान करके सुंदर वस्त्राभूषण धारण किए। उस समय पवनदेव ने उसके कर्णरन्ध्र में प्रवेश कर आते समय आश्वासन दिया कि तेरे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा और ऐसा ही हुआ भी।
दूसरी कथा : एक बार अयोध्या के राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि हवन कर रहे थे। हवन समाप्ति के बाद प्रसाद की खीर तीनों रानियों में थोड़ी बांट दी। खीर का एक भाग एक कौआ अपने साथ एक जगह ले गया जहां अंजनी तपस्या कर रही थीं। तपस्या करती अंजना के हाथ में जब खीर आई तो उन्होंने उसे शिवजी का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लिया। इसी प्रसाद की वजह से हनुमान का जन्म हुआ।
हनुमानजी की चमत्कारी पौराणिक कथाएं
वाल्मीकि रामायण के अलावा दुनियाभर की रामायण में हनुमानजी के संबंध में सैंकड़ों कथाओं का वर्णन मिलता है। उनके बचपने से लेकर कलयुग तक तो हजारों कथाएं हमें पढऩे को मिल जाती हैं। हनुमानजी को कलयुग का संकट मोचन देवता कहा गया है। एकमात्र इन्हीं की भक्ति फलदायी है। आओ जानते हैं कि कौनसी 5 ऐसी पौराणिक कथाएं हैं जो आज भी प्रचलित हैं।
1. चारों जुग परताप तुम्हारा : लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी श्रीराम से याचना करते हैं- ”यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।।
अर्थात : ‘हे वीर श्रीराम! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहें।’ इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं- ‘एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशय:। चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्ति: शरीरे प्यवस्तथा। लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।’
अर्थात् : ‘हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी।’ चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
2. दो बार उठाया था संजीवनी पर्वत : एक बार बचपन में ही हनुमानजी समुद्र में से संजीवनी पर्वत को देवगुरु बृहस्पति के कहने से अपने पिता के लिए उठा लाते हैं। यह देखकर उनकी माता बहुत ही भावुक हो जाती है। इसके बाद राम-रावण युद्ध के दौरान जब रावण के पुत्र मेघनाद ने शक्तिबाण का प्रयोग किया तो लक्ष्मण सहित कई वानर मूर्छित हो गए थे। जामवंत के कहने पर हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने द्रोणाचल पर्वत की ओर गए। जब उनको बूटी की पहचान नहीं हुई, तब उन्होंने पर्वत के एक भाग को उठाया और वापस लौटने लगे। रास्ते में उनको कालनेमि राक्षस ने रोक लिया और युद्ध के लिए ललकारने लगा। कालनेमि राक्षस रावण का अनुचर था। रावण के कहने पर ही कालनेमि हनुमानजी का रास्ता रोकने गया था। लेकिन रामभक्त हनुमान उसके छल को जान गए और उन्होंने तत्काल उसका वध कर दिया।
3. विभीषण और राम को मिलाना : जब हनुमानजी सीता माता को ढूंढते-ढूंढते विभीषण के महल में चले जाते हैं। विभीषण के महल पर वे राम का चिह्न अंकित देखकर प्रसन्न हो जाते हैं। वहां उनकी मुलाकात विभीषण से होती है। विभीषण उनसे उनका परिचय पूछते हैं और वे खुद को रघुनाथ का भक्त बताते हैं। हनुमान और विभीषण का लंबा संवाद होता है और हनुमानजी जान जाते हैं कि यह काम का व्यक्ति है।
इसके बाद जिस समय श्रीराम लंका पर चढ़ाई करने की तैयारी कर रहे होते हैं उस दौरान विभीषण का रावण से विवाद चल रहा होता है अंत में विभीषण महल को छोडक़र राम से मिलने को आतुर होकर समुद्र के इस पार आ जाते हैं। वानरों ने विभीषण को आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रु का कोई खास दूत है। कोई भी विभीषण पर विश्वास नहीं करता है।

सुग्रीव कहते हैं- ‘हे रघुनाथजी! सुनिए, रावण का भाई मिलने आया है।’ प्रभु कहते हैं- ‘हे मित्र! तुम क्या समझते हो?’ वानरराज सुग्रीव ने कहा- ‘हे नाथ! राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला न जाने किस कारण आया है।’ ऐसे में हनुमानजी सभी को दिलासा देते हैं और राम भी कहते हैं कि मेरा प्रण है कि शरणागत के भय को हर लेना चाहिए। इस तरह हनुमानजी के कारण ही श्रीराम-विभीषण का मिलन सुनिश्चित हो पाया।
4. सबसे पहले लिखी रामायण : शास्त्रों के अनुसार विद्वान लोग कहते हैं कि सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी एक शिला (चट्टान) पर अपने नाखूनों से लिखी थी। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और यह ‘हनुमद रामायण’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह घटना तब की है जबकि भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या में राज करने लगते हैं और श्री हनुमानजी हिमालय पर चले जाते हैं। वहां वे अपनी शिव तपस्या के दौरान की एक शिला पर प्रतिदिन अपने नाखून से रामायण की कथा लिखते थे। इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम की महिमा का उल्लेख करते हुए ‘हनुमद रामायण’ की रचना की।
कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि ने भी ‘वाल्मीकि रामायण’ लिखी और लिखने के बाद उनके मन में इसे भगवान शंकर को दिखाकर उनको समर्पित करने की इच्छा हुई। वे अपनी रामायण लेकर शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंच गए। वहां उन्होंने हनुमानजी को और उनके द्वारा लिखी गई ‘हनुमद रामायण’ को देखा। हनुमद रामायण के दर्शन कर वाल्मीकिजी निराश हो गए।
वाल्मीकिजी को निराश देखकर हनुमानजी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होंने बड़े ही कठिन परिश्रम के बाद रामायण लिखी थी लेकिन आपकी रामायण देखकर लगता है कि अब मेरी रामायण उपेक्षित हो जाएगी, क्योंकि आपने जो लिखा है उसके समक्ष मेरी रामायण तो कुछ भी नहीं है। तब वाल्मीकिजी की चिंता का शमन करते हुए श्री हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठाकर समुद्र के पास गए और स्वयं द्वारा की गई रचना को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है। वह आज भी समुद्र में पड़ी है।
5. हनुमान और अर्जुन : आनंद रामायण में वर्णन है कि अर्जुन के रथ पर हनुमान के विराजित होने के पीछे भी कारण है। एक बार किसी रामेश्वरम तीर्थ में अर्जुन का हनुमानजी से मिलन हो जाता है। इस पहली मुलाकात में हनुमानजी से अर्जुन ने कहा- ‘अरे राम और रावण के युद्घ के समय तो आप थे?’

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