उत्तराखंड में भी ग्लोबल वार्मिंग का असर साफ दिखाई देने लगा है. बारिश और बर्फबारी ना होने से काश्तकार चिंतित हैं.
देहरादून (उत्तराखंड): मौसम के बदलते रुख के बीच उत्तराखंड में अब एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है. दरअसल जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश और बर्फबारी मानो गायब सी हो चुकी है ऐसे में नई चिंता मौजूदा फसलों और बागवानी को लेकर है. खासकर सेब से जुड़े किसान तो इस बार भारी नुकसान होने को लेकर आशंकित हैं. ऐसे में सभी को अगले एक हफ्ते के भीतर बर्फबारी या अच्छी बारिश का इंतजार है.
काश्तकारों को बारिश और बर्फबारी की आस: मौसम के बदलते मिजाज के बीच उत्तराखंड में एक नई और गंभीर मुसीबत खड़ी हो गई है. जलवायु परिवर्तन के असर से राज्य में बारिश और बर्फबारी मानो गायब होती जा रही है. इसका सीधा असर मौजूदा खेती और बागवानी पर पड़ रहा है. हालात ऐसे हैं कि किसान अगले एक हफ्ते के भीतर अच्छी बारिश या बर्फबारी की आस लगाए बैठे हैं. खासतौर पर सेब से जुड़े बागवान इस बार भारी नुकसान की आशंका जता रहे हैं.
मौसम की बेरुखी पड़ रही भारी: अक्टूबर महीने में कुछ स्थानों पर हुई हल्की बारिश के बाद नवंबर और दिसंबर पूरी तरह शुष्क रहा. किसानों को उम्मीद थी कि दिसंबर के आखिरी दिनों या जनवरी के पहले हफ्ते तक अच्छी बारिश या बर्फबारी होगी, जिससे मौसम की बेरुखी कुछ हद तक संतुलित हो सकेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दिसंबर लगभग सूखा निकल गया और जनवरी के पहले सप्ताह में भी अब तक कोई मजबूत संकेत नजर नहीं आ रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि खेती और बागवानी दोनों ही संकट में आ गई हैं.
नमी की कमी फसलों के लिए नुकसानदायक: मौसम विभाग भले ही आने वाले कुछ दिनों में हल्की बारिश और ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी के संकेत दे रहा हो, लेकिन भारी बर्फबारी या व्यापक बारिश की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है. बीते कुछ महीनों में वातावरण में नमी की जो भारी कमी आई है, उसकी भरपाई केवल अच्छी बारिश या पर्याप्त बर्फबारी से ही संभव है. नमी की यह कमी फसलों के विकास के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो रही है.
सेब उत्पादक ज्यादा परेशान: इस स्थिति से सबसे ज्यादा चिंता सेब उत्पादक किसानों को है. पिछले साल भी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब की बागवानी कुछ खास बेहतर नहीं रही थी. उस दौरान तेज बारिश के कारण नुकसान हुआ और बाजार तक सेब पहुंचाना भी मुश्किल हो गया, जिससे किसानों को आर्थिक झटका लगा. लेकिन इस बार हालात और भी गंभीर हैं, क्योंकि सेब की अच्छी फसल होने को लेकर ही संदेह बना हुआ है.
सेब की अच्छी पैदावार के लिए बर्फबारी बेहद जरूरी होती है. पिछले दो वर्षों से पर्याप्त बर्फबारी नहीं हो पाई, जिसके कारण सेब उत्पादन वाले क्षेत्र लगातार सिमटते जा रहे हैं. यदि इस बार भी समय पर बर्फ नहीं गिरी, तो नुकसान और बढ़ सकता है.
आनंद बिष्ट, सेब काश्तकार
सेब पैदावार पर ग्लोबल वार्मिंग का असर: सेब की पैदावार के लिए कम से कम 1000 से 1600 घंटे का ‘चिलिंग पीरियड’ जरूरी होता है, जिसमें तापमान शून्य से नीचे, करीब -7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना चाहिए. जलवायु परिवर्तन के कारण कई क्षेत्र पहले से ज्यादा गर्म हो रहे हैं, जिससे वहां सेब की खेती मुश्किल होती जा रही है. यही वजह है कि ग्लोबल वार्मिंग का सबसे गहरा असर सेब किसानों पर देखने को मिल रहा है.
बारिश ना होने से नमी खत्म: अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर और जनवरी का पहला सप्ताह सेब की फसल के लिए सबसे अहम समय माना जाता है. इन महीनों में करीब 100 दिनों की ठंडी अवधि फसल की गुणवत्ता तय करती है. लेकिन इस बार बर्फबारी तो दूर, बारिश भी न होने से वातावरण से नमी लगभग खत्म हो चुकी है, जो सेब के लिए बेहद खराब संकेत है.
सरकार मौजूदा हालात से बेहद चिंतित है और मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक अच्छी बारिश और बर्फबारी की उम्मीद कर रही है. सरकार ने हालात का आकलन करने के लिए सर्वे भी शुरू कराया है और अधिकारियों को किसानों से संवाद कर क्षति का आकलन करने के निर्देश दिए गए हैं. संकट की इस घड़ी में सरकार किसानों के साथ खड़ी है और हर संभव सहायता देने को तैयार है.
गणेश जोशी, कृषि एवं उद्यान मंत्री उत्तराखंड
अधिकतर खेती बारिश पर निर्भर: गौर करने वाली बात यह है कि समस्या केवल बागवानी तक सीमित नहीं है. पहाड़ी क्षेत्रों में गेहूं, जौ और मटर जैसी फसलें भी खतरे में हैं. पर्वतीय इलाकों में सिंचित भूमि बेहद कम है और अधिकतर खेती बारिश पर निर्भर करती है. ऐसे में यदि आने वाले दिनों में मौसम ने राहत नहीं दी, तो उत्तराखंड के किसानों के लिए यह साल बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.








