मेरा हमेशा से सपना रहा कि मैं किसी मूक फिल्म में काम करूं। जब गांधी टॉक्स मेरे पास आई, तो मैं सच में बेहद खुश हुई। फिल्म की टीम ने इसे और भी दिलचस्प बना दिया। जिस तरह किशोर (निर्देशक) ने इसका ढांचा बनाया, रहमान ने शानदार संगीत दिया और विजय सेतुपति, अरविंद स्वामी व सिद्धार्थ जाधव जैसे बेहतरीन कलाकार मिले। सबने मिलकर इस फिल्म को खास बना दिया। इसके अलावा मेरे किरदार को लेकर किशोर ने साफ कहा था कि यह सिर्फ एक लव इंटरेस्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि कहानी का भावनात्मक हिस्सा भी है।

एक्टर होने के नाते हर फिल्म अपने आप में चुनौती होती है पर मूक फिल्म की चुनौतियां थोड़ी अलग ही होती हैं। इसमें संवाद ही नहीं होते। सब कुछ आपकी बॉडी लैंग्वेज, आपकी आखों और भीतर क्या महसूस हो रहा है उस पर निर्भर करता है। बिन कुछ कहे अपनी भावनाएं दिखाने की यह प्रक्रिया मुझे बहुत पसंद है।
यह सच है कि मूक फिल्म कई लोगों के लिए नई चीज है, इसलिए इसकी पेस थोड़ी धीमी है। दुर्भाग्य से, हम फिल्मों को थिएटर में बढ़ने ही नहीं देते क्योंकि हम शुक्रवार के अंत तक ही फिल्म की किस्मत का फैसला कर देते हैं। सच ताे यह है कि ऐसी फिल्मों को समय चाहिए। इन्हें ध्यान देकर महसूस करना पड़ता है।
बात बस इतनी सी है कि अगर मुझे अच्छा काम मिलेगा तो ही मैं हिंदी फिल्में करूंगी। सच्चाई यह है कि हम जैसे लोग जो बाहर से बॉलीवुड में आते हैं, हमें हर फिल्म के साथ बॉलीवुड में खुद को साबित करना पड़ता है और मैं यह बिना किसी शिकायत या नकारात्मकता के कह रही हूं। ऐसा कभी नहीं होता कि हमने पांच फिल्मों के कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिए हों। हमें हर नई फिल्म में खुद को फिर से प्रूव करना पड़ता है। मैं 2011 से काम कर रही हूं और मेरा मानना है कि टैलेंट अपना रास्ता खुद बना लेता है। बाकी मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे देश के कई शानदार निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला।
