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  • जंगल का सफेद सोना बोड़ा, दुर्लभ और स्वाद के कारण डिमांड ज्यादा,5 हजार रुपए तक पहुंच जाती है कीमत
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जंगल का सफेद सोना बोड़ा, दुर्लभ और स्वाद के कारण डिमांड ज्यादा,5 हजार रुपए तक पहुंच जाती है कीमत

Nkc News Desk June 25, 2026

दंतेवाड़ा : बस्तर के घने साल वनों में जैसे ही मानसून की पहली फुहारें धरती को भिगोती हैं, जंगल एक अनमोल प्राकृतिक उपहार को जन्म देता है. यह उपहार है बोड़ा. जिसे बस्तर के आदिवासी और स्थानीय समुदाय सदियों से अपनी पारंपरिक खाद्य संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मानते आए हैं. स्वाद, पौष्टिकता, दुर्लभता और जंगल से उसके गहरे संबंध के कारण बोड़ा को बस्तर का सफेद सोना भी कहा जाता है.

मानसून के शुरुआती दिनों में उगता है बोड़ा
बारिश के शुरुआती दिनों में बोड़ा की तलाश ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष गतिविधि बन जाती है. सुबह-सुबह ग्रामीण साल के जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं और जमीन की सतह पर उभरने वाले इस दुर्लभ खाद्य कवक को सावधानीपूर्वक एकत्रित करते हैं. इसकी उपलब्धता सीमित होने के कारण बाजार में मांग हमेशा अधिक रहती है.यही वजह है कि कई बार इसकी कीमत 3,000 से 4,000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. स्थानीय साप्ताहिक बाजारों में इसकी बिक्री से ग्रामीण परिवारों को अच्छी अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है.

पारंपरिक स्वाद के कारण है मशहूर
बोड़ा की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उसका अनूठा स्वाद और प्राकृतिक खुशबू है.मिट्टी की सौंधी महक से भरपूर यह कवक पकने के बाद बेहद स्वादिष्ट हो जाता है.स्थानीय लोग इसे मसालेदार सब्जी, भुजिया और पारंपरिक व्यंजनों के रूप में तैयार करते हैं.बस्तर के कई परिवारों में बारिश के मौसम में बोड़ा की सब्जी बनाना एक परंपरा जैसा माना जाता है.

बोड़ा की डिमांड क्यों है ज्यादा ?
स्वाद के साथ-साथ बोड़ा अपने पौष्टिक गुणों के लिए भी जाना जाता है. इसमें प्रोटीन, फाइबर, खनिज और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को ऊर्जा देते हैं. प्राकृतिक रूप से उगने के कारण इसमें किसी प्रकार के रासायनिक तत्वों का प्रभाव नहीं होता, जिससे यह एक शुद्ध एवं स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ माना जाता है.

साल के जड़ों से लेता है पोषण
एमडी डॉ. संजय बघेल के अनुसार बोड़ा एक विशेष प्रकार का कवक है, जिसका वैज्ञानिक नाम Astraeus hygrometricus है. यह मुख्य रूप से साल वृक्षों की जड़ों के आसपास रेतीली मिट्टी में विकसित होता है. इसमें क्लोरोफिल नहीं होता, इसलिए यह अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकता और साल वृक्षों की जड़ों से पोषण प्राप्त करता है.

यह कवक वृक्षों को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस समेत अन्य पोषक तत्व उपलब्ध कराने में भी सहायता करता है. इस पारस्परिक लाभकारी संबंध को वैज्ञानिक भाषा में सहजीवी संबंध (सिंबायोटिक रिलेशन) कहा जाता है. इसी कारण बोड़ा को एक्टोमाइकोराइजल कवक की श्रेणी में रखा जाता है. यह संबंध पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है- डॉ संजय बघेल, एमडी

कैसा होता है बोड़ा का जीवन चक्र ?
बोड़ा का जीवन चक्र बेहद रोचक है. प्रारंभिक अवस्था में यह जमीन के भीतर छोटी गोल आकृति में विकसित होता है. पर्याप्त नमी मिलने पर यह सतह पर उभरता है और समय के साथ इसका बाहरी आवरण फैलकर तारे जैसी संरचना बना लेता है.इसके भीतर मौजूद गूदेनुमा भाग बीजाणु संरचना (स्पोर बॉल) होता है, जो सूखने के बाद पाउडर के रूप में फैलकर नए बोड़ा के विकास का आधार बनता है.

साप्ताहिक बाजार में बिकता है बोड़ा

साप्ताहिक बाजार में बोड़ा बेचने आए ग्रामीण तले नाग ने बताया कि बस्तर के बारसूर, कोंडागांव, जगदलपुर और आसपास के साल वन क्षेत्रों में बोड़ा अधिक मात्रा में पाया जाता है.

ग्रामीण जंगलों से इसे इकट्ठा कर बाजारों तक पहुंचाते हैं, जहां इसकी भारी मांग रहती है.बोड़ा न केवल स्वादिष्ट और पौष्टिक आहार है, बल्कि अनेक परिवारों की मौसमी आय का महत्वपूर्ण स्रोत भी बन चुका है- तले नाग, ग्रामीण
बस्तर का बोड़ा केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा और आजीविका का अद्भुत संगम है.यह हमें याद दिलाता है कि जंगलों की समृद्धि केवल पेड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके भीतर छिपे ऐसे अनमोल खजानों में भी बसती है, जो स्थानीय संस्कृति, स्वास्थ्य और जीवन का आधार हैं. बोड़ा जैसी वन संपदाओं का संरक्षण न केवल पर्यावरणीय संतुलन के लिए आवश्यक है, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

Tags: 5 हजार कारण डिमांड ज्यादा जंगल दुर्लभ और स्वाद बस्तर सफेद सोना बोड़ा

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