
धनतेरस, दिवाली और छठ। फिर शादियों का सिलसिला। त्योहारों के अलग-अलग रंग होंगे तो जाहिर है, इस मौके पर आप अपने परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के साथ खुशी बांटने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहेंगे। ऐसे में पटाखे भी जरूर छोड़े जाएंगे। मगर, क्या आप चाहेंगे कि आपकी खुशी कानफाड़ू शोर और आंखों में जलन महसूस कराने वाले पटाखों के धुएं में छिप जाए। ताे फिर क्यों न हम ऐसे पटाखे छोड़ें, जो सबको खुशी तो दे ही, साथ में पॉल्यूशन भी कम करे। आइए फिर बात करते हैं E-क्रैकर्स और ग्रीन पटाखों की।
E-क्रैकर्स रिमोट के जरिए छोड़े जाने वाले क्रैकर्स हैं। यानी रिमोट का बटन दबाया और पटाखे जल उठेंगे। भारत में पहली बार E-लड़ी, E-अनार, E-स्पार्कल पटाखे तैयार किए गए हैं। जिस तरह सामान्य पटाखे या ग्रीन पटाखे हैं वैसे ही ये पटाखे भी साउंड करते हैं, रंग-बिरंगी रोशनी बिखेरते।
E-पटाखों में धुआं नहीं होता और न ही PM2.5 ही निकलता है। इन पटाखों को काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च और नेशनल एन्वॉयरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने मिलकर तैयार किया है।
खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट पर 80 प्रतिशत महिलाओं ने काम किया है। E-पटाखों की डिजाइन, मॉडल, स्ट्रक्चर और केमिकल कंपोनेंट सब कुछ महिला वैज्ञानिकों ने ही तैयार किया है।
E-क्रैकर्स हाई वोल्टेज इलेक्ट्रोस्टैटिक डिस्चार्ज के सिद्धांत पर काम करता है। इसी के जरिए लाइट या साउंड इफेक्ट होता है। अभी E-क्रैकर्स का प्रोटोटाइप तैयार किया गया है।
दिल्ली में ग्रीन पटाखे भी नहीं छोड़ सकेंगे
हम-आप यह सोचकर ग्रीन पटाखे छोड़ते हैं कि इससे पॉल्यूशन नहीं होगा। पर क्या ऐसा सही में होता है? एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिस तरह सामान्य पटाखे चलाने से शोर और हवा दूषित होती है उसी तरह ग्रीन पटाखों से भी नॉइज और एयर पॉल्यूशन दोनों होते हैं। ग्रीन पटाखों में भी खतरनाक केमिकल्स होते हैं, और वो भी उतने ही नुकसानदेह होते हैं। अंतर सिर्फ इतना है ग्रीन पटाखे रेगुलर पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाते हैं।
इसे देखते हुए ही दिल्ली में इस बार ग्रीन पटाखों सहित सभी तरह के पटाखों के प्रोडक्शन, ब्रिक्री और उनके इस्तेमाल पर 1 जनवरी 2023 तक प्रतिबंध रहेगा। दिल्ली के रहने वाले लोग ऑनलाइन पटाखे की खरीद-बिक्री भी नहीं कर सकेंगे। हालांकि, बैन के बावजूद दिल्ली में ऑनलाइन-ऑफलाइन पटाखों की बिक्री की जा रही है। इंटरनेट पर ‘फायरक्रैकर्स नियर मी’ सर्च करने पर पटाखे मिलने के कई ऑप्शन दिख रहे। कई कंपनियां होम डिलीवरी की भी सुविधा दे रही हैं। इधर, सेंट्रल GST टीम ने फरीदाबाद के पलवल गांव में छापेमारी कर 10 करोड़ के बैन क्रैकर्स को पकड़ा।
इन्हें ग्रीन क्रैकर्स क्यों कहते हैं?
नेशनल एन्वॉयरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक ‘ऐसे पटाखे जिनसे रेगुलर पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण हो, हवा में पार्टिकुलेट मैटर यानी PM में 30 से 40 प्रतिशत की कमी आए, सल्फर डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड घटे और दूसरी खतरनाक गैसों में भी 10 प्रतिशत की कमी हो’। इन मानकों पर खरा उतरने वाले पटाखों को ही ग्रीन क्रैकर्स कहा जाता है। काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के वैज्ञानिकों का ये मानना है चूंकि ये पटाखे एन्वायर्नमेंट को कम नुकसान पहुंचाते हैं और पर्यावरण से हरा रंग जुड़ा है। इसलिए इन्हें ग्रीन क्रैकर्स का नाम मिल गया।
CSIR दिल्ली ने ग्रीन पटाखों का आइडिया सबसे पहले दिया और इन पटाखों का इस्तेमाल सिर्फ भारत में ही हो रहा है। दुनिया के किसी भी देश में इको फ्रेंडली क्रैकर्स की शुरुआत नहीं हुई है।
कुछ चीनी पटाखे ग्रीन क्रैकर्स के रूप में बेचे जाते हैं। लेकिन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (IICT) हैदराबाद ने इन चाइनीज क्रैकर्स को ग्रीन क्रैकर्स मानने से इंकार कर दिया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि चाइनीज पटाखों में बेरियम नाइट्रेट, एल्यूमिनियम, लिथियम, लेड का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में इन्हें ग्रीन क्रैकर्स नहीं कहा जा सकता।
ग्रीन पटाखों को तैयार करने की जरूरत क्यों पड़ी…?
अपने देश में दशहरा, दिवाली और अन्य त्योहारों और शादी-ब्याह पर पटाखे छोड़ने की परंपरा रही है, लेकिन इन पटाखों की वजह से होने वाले प्रदूषण को हमने हमेशा नजरअंदाज किया गया। इसे देखते हुए CSIR ने ग्रीन पटाखों का फॉर्मूला तैयार किया।CSIR-NEERI की ओर से चुनी हुई कंपनियों को ग्रीन क्रैकर्स बनाने की अनुमति दी गई है। कंपनियों को प्रोडक्शन शुरू करने से पहले पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (PESO) से एनओसी लेनी पड़ती है। नीचे के ग्रैफिक से इसे जानें।
ग्रीन पटाखों में ऐसा क्या है जो अब तक बिकने वाले पटाखों में नहीं था
पारंपरिक पटाखों में मुख्य रूप से बेरियम नाइट्रेट (BaNO3) होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बेरियम नाइट्रेट हमारी सांस की नली या खाने के सहारे शरीर के अंदर पहुंच जाए तो यह जहर का काम करता है। इससे चेहरे और गर्दन में खिंचाव, डायरिया, पेट दर्द, घबराहट, सांस लेने में परेशानी, हार्ट बीट बढ़ना जैसी समस्याएं होती हैं। जिनका समय पर इलाज न हो तो व्यक्ति की जान तक जा सकती है।
वहीं, ग्रीन पटाखों में बेरियम नाइट्रेट नहीं होता। इसकी जगह ग्रीन पटाखों में पोटैशियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया जाता है। पोटैशियम नाइट्रेट के सीधे संपर्क में आने पर आंखों में जलन और स्किन पर रैशेज हो जाते हैं। ग्रीन पटाखों में बेरियम की जगह पोटैशियम का इस्तेमाल इसलिए होता है क्योंकि ऑक्सीडाइजिंग प्रोसेस से पोटैशियम घुल जाते हैं। इससे लोगों की सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ता।
सल्फर डाई ऑक्साइड: ट्रेडिशनल पटाखों की तरह ग्रीन पटाखों में भी सल्फर का इस्तेमाल होता है। हालांकि, इसकी मात्रा कम होती है। सल्फर की गंध बेहद तीखी होती है। सांस की नली में सल्फर पहुंचने पर 10 से 15 मिनट में ही सांस लेने में परेशानी, छाती में खिंचाव और खांसी आने लगती है।
एल्यूमिनियम: एल्यूमिनियम पाउडर का इस्तेमाल दोनों तरह के पटाखों में किया जाता है। ग्रीन पटाखों में सिर्फ इसकी मात्रा कम होती है।
NEERI की चीफ साइंटिस्ट डॉ. साधना रायलू बताती हैं कि सामान्य पटाखों की तुलना में ग्रीन क्रैकर्स में हानिकारक तत्व कम निकलते हैं। CSIR-NEERI ने तीन तरह के ग्रीन क्रैकर्स बनाए हैं। इन क्रैकर्स के बनने के पीछे की तकनीक क्या है इसे जानने के लिए ग्रैफिक देख लेते हैं।
पाइरोटेक्निक कंपोजिशन से बनते हैं ग्रीन पटाखे
NEERI ने दैनिक भास्कर को भेजे ई-मेल में बताया कि ग्रीन पटाखे पाइरोटेक्निक कंपोजिशन से बनते हैं। यानी पटाखे में आग लगते ही शोर के साथ रंग-बिरंगी रोशनी पैदा होती है। NEERI ने जो ग्रीन पटाखे तैयार किए हैं उनमें सिंगल शेल क्रैकर्स, मरून, एटम बंब, फ्लावर पॉट, पेंसिल और स्पार्कल हैं। इनमें बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल नहीं होता। इन्हें नए फॉर्मूले के तहत तैयार किया गया है जिनसे 50 से 70 प्रतिशत तक प्रदूषण कम किया जा सकेगा।
पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) चंडीगढ़ के एडिशनल प्रोफसर डॉ. रविंद्र खैवाल बताते हैं कि रेगलुर क्रैकर्स में 160 से 200 डेसिबल तक आवाज होती है जबकि ग्रीन पटाखों में यह 100 से 130 डेसिबल होता है। यानी इनसे पारंपरिक पटाखों के मुकाबले शोर कम होता है।
ग्रीन पटाखों में हानिकारक केमिकल्स जैसै-सल्फर नाइट्रेट, ऑर्सेनिक, मैग्नेशियम, सोडियम, लीड और बेरियम नहीं होते। बावजूद इसमें पोटैशियम नाइट्रेट और एल्युमिनियम का इस्तेमाल किया जाता है।
पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुमन मोर कहती हैं रेगुलर पटाखों के मुकाबले ग्रीन पटाखों से निश्चित रूप से प्रदूषण में कमी आती है। ‘फायरवर्क्स बैन ऑन एयर क्वालिटी ओवर द स्टेट्स ऑफ इंडो गैंगेटिक प्लेन्स एयरशेड इन इंडिया’ नाम से फायर क्रैकर्स पर रिसर्च में पटाखों के इस्तेमाल के बाद उसके असर के बारे में विस्तार से बताया गया है। डॉ. सुमन मोर बताती हैं कि इस रिपोर्ट में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में दिवाली के समय होने वाली आतिशबाजी पर अध्ययन किया गया है।
2020 में जब कोविड का प्रकोप था तब दिवाली पर सभी तरह के पटाखे छोड़ने पर बैन लगाया गया था। इस बैन का काफी प्रभाव पड़ा। 2017-2019 के मुकाबले PM 2.5 में 42 प्रतिशत की कमी आई। जबकि SO2 में 67 प्रतिशत की कमी देखने को मिली।
ट्रेडिशनल पटाखों में कौन-कौन से केमिकल्स होते हैं क्या आपने कभी जाना है। ये हमारे स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करते हैं आइए जानते हैं।
पटाखों से बन सकते हैं बहरे, प्रेग्नेंट वुमन और बच्चों के लिए खतरनाक
आरकेएलसी मेट्रो हॉस्पिटल दिल्ली के पल्मनोलॉजिस्ट डॉ. राकेश कुमार यादव बताते हैं कि नवजात, बच्चे, प्रेग्नेंट महिलाएं, बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार लोगों को पटाखों से सबसे ज्यादा परेशानी होती है। अस्थमा रोगियों की समस्या बढ़ जाती है।
हार्ट पेशेंट के लिए भी यह नुकसानदेह है। पटाखों के शोर के कारण बीमार लोगों में बेचैनी बढ़ती है। लोग हाइपरटेंशन के शिकार हो जाते हैं।
मनुष्यों में 60 डेसिबल तक साउंड सुनने को आदर्श माना जाता है। लेकिन पटाखों से 150 डेसिबल से भी अधिक आवाज निकलती है। इससे स्थायी रूप से कोई बहरा बन सकता है। खासकर बच्चों के कान के परदे फट सकते हैं।
पटाखों से निकलने वाली रंग-बिरंगी रोशनी से हमारी आंखें चौंधिया जाती है। अलग-अलग पटाखों के अलग-अलग रंग उनमें मौजूद केमिकल्स की वजह से होते हैं। आप भी जानें कि कौन-कौन से तत्वों के मिलने से कौन से रंग निकलते हैं।
फायर क्रैकर्स में एक्सप्लोसिव्स की कम मात्रा का इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर इसमें बेरियम नाइट्रेट, पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फर, एल्यूमिनियम होता है।
गन पाउडर को जब किसी कंटेनर में पैकेट में सील किया जाता है तो इसे एक ट्यूब के जरिए जलाया जाता है। यह एक छोर से दूसरे छोर तक जलता है। जब इनमें गैस बनती है तब विस्फोट होता है। लेकिन फौज जिन बम का इस्तेमाल करती है उनमें हाई एक्सप्लोसिव्स होता है।
कुछ एक्सप्लोसिव्स को अल्ट्रा सेंसेटिव माना जाता है। हीट होने या घर्षण होने पर तुरंत इनमें विस्फोट हो जाता है। जैसे नाइट्रोग्लीसिरीन, मरकरी फलमिनेट और लेड स्टाइफनेट।
इनमें विस्फोट डेटोनेशन के जरिए किया जाता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक्सप्लोसिव्स साउंड की गति से अधिक तेजी से रिएक्ट करता है। कुछ ऐसे एक्सप्लोसिव्स होते हैं जो केवल बिजली के स्पार्क से ही विस्फोट करते हैं जैसै-डायनामाइट, TNT और सेमटेक्स।
पटाखे किस तरह फूटते हैं क्या आपने गौर किया है? चकरी गोल-गोल क्यों नाचती है या रॉकेट ऊपर की तरफ क्यों उड़ जाता है। कुछ पटाखे रंगीन धुआं क्यों छोड़ते हैं। जवाब है इनके भीतर मौजूद केमिकल्स। ये केमिकल्स क्या हैं आइए ग्रैफिक से समझ लेते हैं।
लगभग एक हजार साल पहले चीन में बारूद की हुई थी खोज
चीन में सबसे पहले गन पाउडर यानी बारूद की खोज हुई। माना जाता है कि चीन के रसायनशास्त्रियों ने 950 ईसवी में गन पाउडर की खोज तब की जब वो पानी और अल्कोहल को लेकर प्रयोग कर रहे थे। कुछ इतिहासकार इसे पहली सदी की खोज बताते हैं। पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फर और चारकोल (ड्राई हनी का भी इस्तेमाल) के मिश्रण का ही गन पाउडर था। इस पाउडर को लोग स्किन से जुड़ी बीमारियां ठीक करने, कीड़े-मकोड़े मारने के लिए भी घरों में भी छिड़कते।
‘क्लासिफाइड एसेंशियल्स ऑफ द मिस्टिरयस ताओ ऑफ द ट्रू ओरिजन ऑफ थिंग्स’ में गनपाउडर से जुड़ा फॉर्मूला प्रकाशित हुआ। इसमें बताया गया कि गनपाउडर पर प्रयोग करने वालों के हाथ और चेहरे जल गए। जहां वे लोग काम कर रहे थे वह घर भी जल कर राख हो गया। बताया जाता है कि 1160 ई तक चीन पूरी दुनिया में गनपाउडर बेचने लगा था।
भारत तीज-त्योहारों का देश है। हर उत्सव को सेलिब्रेट किया जाता है। ऐसे में पटाखों का महत्व बढ़ जाता है। पटाखों की दुनिया में भारत कहां है, आइए जानते हैं।
प्राचीन भारत में भी इस्तेमाल होते थे गन पाउडर
प्राचीन भारत में भी लोग बारूद से परिचित थे। ‘नीति प्रकाशिका और शुक्रनीति’ में गन पाउडर का उल्लेख मिलता है। 1880 में मद्रास और लंदन से प्रकाशित ‘वेपंस एंड पॉलिटिक्स ऑफ द एंशिएंट हिन्दूज’ नाम की रिपोर्ट में डॉ. गुस्ताव ओपर्ट ने बताया है कि प्राचीन भारत में गन पाउडर का इस्तेमाल एक बड़ी सी बंदूक में किया जाता था। चीन में हुए गन पाउडर की खोज से बहुत पहले की बात है।
भारत में 600 साल पहले से हो रही आतिशबाजी
मध्यकालीन भारत में पटाखों का इस्तेमाल राजघरानों में त्योहार, शादी या किसी विशेष समारोह के दौरान किया जाता था। विजयनगर साम्राज्य के राजा देवराय द्वितीय (1443) के दरबार में तैमूरी राजवंश के सुल्तान शाहरूख का दूत अब्दुर्रज्जाक आया था। उसने अपने यात्रा वृत्तांत में बताया है कि भारत में त्योहारों में पटाखों का इस्तेमाल किया जाता था। ओडिसा के राजघराने के लेखक गजपति प्रतापरूद्रदेव (1497-1539) की संस्कृत पुस्तक ‘कौतुक चिंतामणि’ में पटाखों का जिक्र है जिसमें गन पाउडर होता था।
इतिहासकार सतीश चंद्रा ने अपनी पुस्तक ‘मध्यकालीन भारत: सल्तनत से मुगल तक’ में बताया है कि 1609 ई में बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिल शाह ने अपने दरबारी की बेटी की शादी निजामशाही जनरल मलिक अंबर के बेटे से करने के लिए भारी भरकम दहेज दिया था। इसमें 80 हजार रुपए पटाखों पर खर्च किए गए थे।
भारत ही नहीं पूरी दुनिया में अब दीपावली मनाई जाती है और पटाखे छोड़े जाते हैं। हालांकि कई देशों में दूसरे फेस्टिवल पर भी जमकर आतिशबाजी की जाती है। कुछ देशों में कब-कब आतिशबाजी होती है इसे भी जान लेते हैं।
मुगल काल में होती थी आतिशबाजी
इतिहासकारों ने बताया है कि मुगल काल में आतिशबाजी का चलन था। ‘हिस्ट्री ऑफ फायर वर्क्स इन इंडिया बिटविन 1400 एंड 1900’ के लेखक इतिहासकार पीके गोडे ने बताया है कि अरब व्यापारियों के जरिए चीन का पटाखों का फार्मूला भारत पहुंचा। पुर्तगाली यात्री दुआर्ते बारबोसा ने अपने यात्रा वृत्तांत में बताया है कि वह एक गुजराती परिवार की शादी में शामिल हुआ, जहां जमकर आतिशबाजी की गई।
इतिहासकार इरा मुखौती ने बताया है कि दारा शिकोह की शादी में जमकर आतिशबाजी की गई थी। 18वीं सदी आते-आते भारत में कई राजा-महाराजा दिवाली के मौके पर आतिशबाजी का कार्यक्रम करने लगे थे। धीरे-धीरे आम जनता भी त्योहारों पर आतिशबाजी करने लगी।
तमिलनाडु के शिवकाशी को पटाखा नगरी के रूप में जाना जाता है। माचीस की फैक्ट्री से हुई शुरुआत कैसे पटाखों की नगरी में बदल गई और कारोबार कैसे बढ़ा, नीचे के ग्रैफिक से जानते हैं।
शिवकाशी में कैसे शुरू हुआ पटाखों का उद्योग
भारत में पटाखों की पहली फैक्ट्री कोलकाता में शुरू की गई थी। 1923 में तमिलनाडु के शिवकाशी के रहनेवाले दो भाई ए शणमुगा नाडर और पी अय्या नाडर कलकत्ता गए। वहां एक माचीस की फैक्ट्री में काम करते थे। वहां से लौटने के बाद शिवकाशी में उन्होंने माचीस की फैक्ट्री लगाई। 1940 में दोनों भाइयों ने शिवकाशी में पटाखों की पहली फैक्ट्री खोली।
धीरे-धीरे पटाखों की कई यूनिट खुल गई। शिवकाशी को फायर क्रैकर्स हब बनाने में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के कामराज का बड़ा योगदान रहा।
कामराज का जन्म विरुधनगर जिले में हुआ था जहां शिवकाशी है। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री रहते हुए के कामराज ने जापानी कंसल्टेंट कंपनी के लोगों को बुलाया। उनसे पूछा कि शिवकाशी में कौन सा उद्योग लगाया जा सकता है। तब कंसल्टेंसी ने तीन सुझाव दिए पहला, प्रिंटिंग (छपाई का काम), दूसरा फायर क्रैकर्स इंडस्ट्री और तीसरा दियासलाई उद्योग। शिवकाशी में ये तीनों उद्योग आज भी जीवित हैं।









