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आजादी के सात दशक बाद भी इस गांव में बिजली नहीं… एक हैंडपंप के सहारे जी रहे 50 आदिवासी

NKC News March 15, 2024

 छप्पर के स्कूल में पड़ रहे बच्चे

आवागमन के साधनो की कमी के चलते धूल भरी कच्ची सडक से मिलो पैदल चलना, बरसात के चार महीनों में चिमनी की रोशनी में रात गुजारना, स्वास्थ सुविधा के अभाव में सिरहा-गुनिया के पास इलाज करवाना ग्रामवासियों की नियति बन गई है। पहुँचविहीन होने से बारिश के चार माह पहले राशन का इंतजाम करना पड़ता है। यह हाल है अबुझमाड़ के मसपुर में झोपड़ी में रहने वाले 50 आदिवासी परिवारों का है। इन्हें बुनियादी सेवा सुविधा के लिए सरकारी सेवक को पर भरोसा करना पड़ता है जो अक्सर टूट जाता है।

गांव में 4 हैंडपंप में 2 खराब पैड है। इन्हें सुधारने के लिए कई बार पीएचई के अधिकारियों से कई बार गुहार लगाई जा चुकी है। लेकिन राहत की कोई बूंद नहीं मिली है। एक हैंडपंप से थोड़ा पानी निकलता जरुर जिसमें आयरन ज्यादा होने के कारण वह पीने योग्य नही है। इस लिए पूरा गांव सहित आश्रम शाला से बच्चे 1 हैंडपंप के भरोसे अपनी प्यास बुझाने को मजबूर है। वही निकासी के पानी के लिए ग्रामीण बेलगर नाला के पानी का उपयोग करते है। लेकिन गर्मी के समय मे नाला सुख ज्याता है। इससे गर्मी के दिनों में मसपुर के ग्रामीणों को पानी के लिए दो चार होना पड़ता है।
मुख्य मार्ग से गांव पहुचने के दौरान सड़क के बीचों बीच बहता नाला मुसीबत बन जाता है। नाला में पानी भरा होने के कारण बरसात में मसपुर गांव टापू में तब्दील हो जाता है। आपातकाल में गांव से मुख्यालय पहुचने के लिए ग्रामीणों को पगड़ी का सहारा लेना पड़ता है। आपातकालीन स्थिति में ग्रामीणों को कावड़ में बोहकर 10 किलोमीटर का सफर पैदल तय कर सोनपुर गांव तक पहुचना पड़ता है। जहाँ से एम्बुलेंस के माध्यम से जिला मुख्यालय की ओर रुख करते है।
जिला मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर मसपुर में 5 साल पहले विद्युत पोल खड़े किए गए थे। इससे ग्रामीणों को 24 घंटे लाइट मिलने की उमीद जग गई थी। लेकिन 5 साल बीतने के बावजूद लाइन बिछाने का कार्य प्रारंभ नही हो पाया है। इस लाइट सहित ट्रांसफार्मर के लिए खड़े हुए विद्युत पोल शो पीस बने हुए है। 50 आदिवासी परिवारों के लिए मजबूरी बन गया है। विद्युत विभाग 5 साल बीतने के बावजूद ग्रामीणों की उम्मीदों पर खरा उतरने में कोई रुचि नहीं दिखा रहा है।
मसपुर में शिक्षा में गुणवत्ता तराशने के दावे खोखले साबित होते नजर आते है। पाठशाला के बच्चों को भविष्य शेड्नुमा भवन गढ़ा का रहा है। जहां पर बच्चे बरसात एव गर्मी के दिनों में परेशानियो का सामना करते नजर आते हैं। वही स्कूल में शौचालय-बाथरुम, लाइट सहित पानी की सुविधा का अभाव होने के बावजूद इस पर किसी का ध्यान नहीं जाना समय परे जान पड़ता है।
मसपुर गांव को भले कागजो में उपस्वास्थ्य केंद्र दर्जा मिला है। लेकिन सुविधा के नाम भवन का अभाव बना हुआ है। कच्ची सडक, मोबाइल कनेक्टिविटी के कारण शासन की 102 माताहरी- संजीवनी 108 सुविधा नहीं मिल पाती है। मुसीबत के मारे मरीज को कावड़ में बोहकर मुख्य मार्ग तक लाने के अपने स्तर से वाहन की व्यवस्था कर जिला मुख्यालय की ओर रुख करना पड़ता है।
नए बोर के लिए स्वीकृति प्रदान की जाएंगी
मसपुर गांव में पानी की समस्या को देखकर कलेक्टर साहब को संज्ञान में लेकर नए बोर की स्वीकृति प्रदान की जाएगी। इसके साथ ही अन्य सुविधाओं के लिए यथा संभव प्रयास किया जायेगा।

Tags: 50 आदिवासी एक हैंडपंप गांव में बिजली नहीं

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