- नकली दवाओं के कालेबाजार ने समाज को भयाक्रांत कर रखा है. समाज में इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है. पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के कुछ ऐसे कारोबारियों पर पुलिस ने नकेल डाला, जिनका नेटवर्क इंदौर के सौदागरों से जुड़ा हुआ था. इंदौर की कुछ कंपनियां नकली दवाएं बनाती थीं, पुलिस की कार्रवाई में कई चेहरे बेनकाब हुए हैं. किंतु, इस एक मात्र कार्रवाई से नकली दवा के सौदागरों पर अंकुश लगा पाना मुश्किल है. समाज में ऐसे चेहरे तभी बेनकाब होंगे, जब संबंधित विभाग और पुलिस एक रणनीति पर काम करेगी. बिना कोई भय या संकोच के अपना कैंपेन जारी रखेगी. चिकित्सा जगत में मुनाफाखोरी और लूट-खसोट कोई नई बात नहीं है. लेकिन, इस गोरखधंधे में पिस रहा है आम आदमी. जिनकी सेहत से खिलवाड़ तो किया ही जा रहा है, वहीं जेब भी ढीली हो रही है. ऐसा लगता है,. स्वास्थ्य सेवाओं में जैसे संवेदना नाम की कोई चीज है ही नहीं.
उदाहरण के तौर पर हम आपको बता दें कि, कुछ साल पहले शुगर यानी मधुमेह के लेवल का नए सिरे से निर्धारण किया गया था. जिसको लेकर भारत के चिकित्सा जगत में भूचाल आ गया था. नए वैश्विक पैमाने पर भारत में डॉक्टरों ने कई सवाल उठाए थे. भारत के डॉक्टर नए मानक को मानने को तैयार नहीं हैं. भारत के डॉक्टरों के अपने तर्क-वितर्क हैं. नए वैश्विक पैमाने के मुताबिक अगर शुगर लेवल २५० तक रहता है, तो वे शुगर के पैशेंट नहीं माने जाएंगे. २५० से ऊपर लेवल पहुंचने पर शुगर के पैशेंट माने जाएंगे. वर्तमान मानक के मुताबिक डायबिटी•ा का स्तर (एचबीए१सी) ६.४ $फीसदी से रहने पर शुगर का रोगी माना जाता है, लेकिन अमेरिकन कॉलेज ऑफ $िफ•िाशियंस की सि$फारिश है कि डायबिटी•ा रोगियों का इला•ा करते समय ७-८ प्रतिशत तक स्तर को सामान्य माना जाए. एचबीए १सी यदि ७-८ $फीसदी हो तो मरी•ा में शुगर का लेवल औसत प्रतिदिन २५० ही रहता है. नए मापदंड के अनुसार जिन मरीजों का शुगर लेवल २५० है, वे डायबिटी•ा के रोगी नहीं माने जाएंगे. अगर ऐसा हुआ तो भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या काफी कम हो जाएगी. यहां पर सवाल इसी बात को लेकर उठ रहा है. चिकित्साजगत का धंधा मंदा हो जाएगा. जानकार तो यह भी बताते हैं कि पहले मुधमेह का लेवल (एचबीए१सी) ११-१२ था. किंतु, चिकित्सा जगत के माफियों ने मधुमेह की दवाओं, उपकरणों की अधिक से अधिक बिक्री, $खाली-पीली बैठे डॉक्टरों एक्टिव करने और खंडहर होते अस्पतालों को गुल•ाार करने शुगर का लेवल गिरा दिया. यही वजह है कि भारत में शुगर के मरी•ाों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई. आज भारत का शहर तो शहर, ग्रामीण इलाका शुगर मरीजों से भरा पड़ा है.

माना कि आज की भागमभाग, तनावपूर्ण जीवनशैली, $गलत खान-पान, दुव्र्यसन, उचित चिकित्सा या समय पूर्व असावधानी की वजह से मधुमेह रोगियों की संख्या बढ़ी है. किंतु, इसे ही अंतिम सत्य मान लेना कोई तर्कपूर्ण जवाब नहीं है. दरअसल, चिकित्साजगत में मरी•ाों को लूटने की स्पर्धा में गला मरी•ाों का कट रहा है, मुनाफाखोर तो एक रुपए की दवा को १०० रुपए में बेच रहे हैं. ऐसा क्यों? कारण स्पष्ट है. भारत वर्ष, विश्व व्यापार जगत में एक ऐसा देश है, जहां अपने गंदे और कूड़ा-करकट बेच लो, कोई पड़ताल नहीं होती. हर देश भारत में एक बड़ा बा•ाार खोजता है, जो आसानी से मिल भी जाता है. यही वजह है कि अमानक दवाएं बेखौ$फ बिक रही हैं. जनता के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, किसका शरीर गल रहा है, कौन अपंग हो रहा है, कौन घातक बीमारी की चपेट में आकर मौत को गले लगा रहा है, इसकी परवाह न तो संबंधित विभाग को है, न ही प्रशासन को. कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर •िाले के कानन पेंडारी में नसबंदी के लिए भर्ती एक दर्जन से अधिक महिलाओं की मौत, •ाहरीली दवाओं के सेवन से हुई थी. जिसे लोग आज तक भूल नहीं पाए हैं. हाल ही में मीडिया में प्रकाशित एक $खबर के मुताबिक छत्तीसगढ़ में ऐलोपैथी की ढाई ह•ाार दवाएं बिक रही हैं, जिनमें केवल दस $फीसदी ही पैमाने पर खरी उतरी हैं, बा$की सब अमानक हैं. इससे अनुमान लगा सकते हैं कि भारत में क्या नहीं हो सकता. स्वास्थ्य सेवा जैसी अत्यावश्यक सेवा पर सरकार की उपेक्षा आने वाली नस्ल को कम•ाोर कर रही है, वहीं वर्तमान जीवन को मौत के कुएं में धकेल रही है. बड़े-बड़े नर्सिंग होम, सर्वसुविधायुक्त अस्पतालों में मरी•ाों को कैसे लूटा जाता है, यह बात जग जाहिर है. बेहतर यही होगा कि दवाओं का मूल्य निर्धारण, उसकी क्वालिटी, उसके स्टैंडर्ड, बैच, एमएफजी, एक्सपायरी डेट आदि सारी ची•ाों की गंभीरता से पड़ताल की जाए. स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी पैनी न•ार रखे, •ाहर बेचने वाले मुना$फा$खोरों, दलालों पर अंकुश लगाया जाए, तभी स्वस्थ भारत का निर्माण किया जा सकेगा. अन्यथा मौतों का सिलसिला जारी रहेगा.
